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*दादू बाहर का सब देखिये, भीतर लख्या न जाइ ।*
*बाहर दिखावा लोक का, भीतर राम दिखाइ ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*उपदेश चेतावनी का अंग ८२*
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रज्जब इस औजूद१ में, सैर२ सुलग३ है सौख४ ।
सब सूरत५ सुबहान६ की, तहाँ नहीं यहु जौख७ ॥२१॥
इस शरीर१ दशा में स्थित है, तब तक ही घूमना२ फिरना सुन्दर बात करने वा सुन्दर कंठ३ आदि को देखन की चाह४ रहती है, उस प्रभु का स्वरूप समझने के पश्चात तो सभी रूप५ पवित्र६ प्रभु रूप ही भासेंगे, उस अवस्था में उक्त सुन्दरता आदि के माप-तोल७ का विचार नहीं रहता वा समूह७ में नाना भेद नहीं भासते सभी एक प्रभु रूप ही भासते हैं ।
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रज्जब इस औजूद१ में, इश्क२ इलम३ मासूर४ ।
आशिक५ सौं असना६ वहै७, फासिक८ सों सब दूर ॥२२॥
इस शरीर१ में प्रेम२ और ज्ञान३ ही अज्ञानादि के शत्रु है वा प्रेम और ज्ञान से प्रभु४ प्राप्त होते हैं, प्रेमी५ के प्रेम से वह७ प्रभु सबके बीच६ भासता है और व्यभिचारी८ वा पापी८ से तो वह सभी स्थलों से दूर ही रहता है ।
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रज्जब रीता तू नहीं, गुरु गोविन्द सु माँहिं ।
अक्षय अभय भंडार को, काहे विलसै नाँहिं ॥२३॥
हे प्राणी ! तू खाली नहीं है, तेरे भीतर ज्ञानरूप गुरु और साक्षी रूप गोविन्द है, उस अक्षय ज्ञान निधि और निर्भय स्वरूप प्रभु के साक्षात्कार-जन्य सुख का उपयोग क्यों नहीं करता ?
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मिनख देह माया रु ब्रह्म, जे कोउ लेय कमाय ।
यहु दीक्षा उपदेश यहु, आगे कह्या न जाय ॥२४॥
यदि कोई साधन द्वारा कमाये तो मनुष्य देह में माया और ब्रह्म दोनों ही मिलते हैं, यही गुरु दीक्षा है और यही संत शास्त्रों का उपदेश है, इससे आगे कुछ भी नहीं कहा जाता ।
(क्रमशः)

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