शनिवार, 1 जून 2019

= १२३ =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू सेवक सांई वश किया, सौंप्या सब परिवार ।*
*तब साहिब सेवा करै, सेवक के दरबार ॥*
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*भक्त सेन नाई* ~ *परिचय*
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“जब भक्त लीन होकर भगवान के चरणों में समर्पित हो जाता है तो भगवान भी भाव-विह्वल होकर अपने भक्त की किसी भी सेवा के लिए तत्पर रहते हैं । भगवान अपने भक्त की आन बान शान की रक्षा के लिए ऐसी लीला रचते हैं कि भक्त सदैव प्रसन्नचित्त रहता है ।”
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बुंदेलखंड राज्य में बांधवगढ़ नाम की एक नगरी थी । प्राकृतिक रूप से यह नगर अत्यंत समृद्ध था ही नगर के निवासी भी सभ्य सज्जन और सुसंस्कृत थे । इसी कारण बांधवगढ नगरी राज्य में प्रसिद्ध थी । राजा वीरसिंह भी बांधवगढ़ की संस्कृति से प्रसन्न रहते थे और उन्होंने बांधवगढ़ को ही अपनी राजधानी बनाया ।
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नगर में सेन नाम का एक व्यक्ति था जो जाति से नाई था । वह कहने को तो राजसी नाई था परतु वह प्रत्येक व्यक्ति के लिए कार्य करता था । भगवद्भक्त सेन नाई परम संतोषी उदार और विनयशील था । वह परिश्रम और उससे प्राप्त पारिश्रमिक से ही सतुष्ट रहता था । किसी से अनावश्यक मांग उसने की नहीं थी और न कभी उसे आवश्यकता पड़ी । राज्य व नगर निवासी उसके उदार स्वभाव की प्रशंसा करते न थकते थे । 
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सेन नाई की दिनचर्या नियमित थी । वह प्रात काल स्नान ध्यान और प्रभु स्मरण करने के पश्चात नगर में जिस व्यक्ति के बाल बनाने होते बनाता और तब राज भवन जाता । वहां राजा को स्नान कराता तेल मालिश करने के बाद घर आकर भगवान के भजन में लीन हो जाता । 
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एक दिन प्रात काल स्नान ध्यान व सुमिरन से निवृत्त होकर वह.नगर में भ्रमण कर रहा था । किसी की दाढ़ी मूंछें व्यवस्थित होनी हों इसी उद्देश्य से अपने आगमन का संकेत भजन उच्च स्वर में गा रहा था । उसी नगर में एक साधु मंडली आई हुई थी । सेन नाई की भेंट एक जगह साधु मंडली से हो गई । संत-समागम का सुअवसर मिलने पर सेन नाई प्रसन्नचित हो उठा । उसने साधु मंडली की चरण धूल ली । 
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“महाराज ! कृपा करके गरीब की कुटिया पवित्र करें और मेरे घर जो भी रूखा-सूखा मिले ग्रहण करके मेरा उद्धार करें । साधु तो भाव के भूखे होते हैं । चल पड़े। सेन नाई बड़े मनोयोग और भक्तिभाव से उनकी सेवा में जुट गए । साधुओं के आतिथ्य में इतने लीन हुए कि समय का ध्यान ही न रहा फिर सत्संग चला । सेन नाई तो बाहय संसार भूल गए कि उन्हें क्या करना है । दोपहर होने को आई ।
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उधर राजा वीर सिंह को प्रतीक्षा करते-करते इतना समय हो गया तो उन्होंने एक दास को सेन नाई को बुलाने भेजा । दास राजमहल से निकला ही था कि सेन मिल गए । “आज तुमने देर कर दी । महाराज तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं ।” सिपाही बोला ।
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“भैया ! आज ऐसा ही आवश्यक कार्य पड़ गया अन्यथा.पहले कभी विलम्ब हुआ है ? महाराज क्रोधित होंगे । चलता हूं ।” सेन बोले । अपने कंधे पर उस्तरा, कैंची, दर्पण इत्यादि की पेटी लटकाए सेन लम्बे डगों से राजमहल में प्रविष्ट हो गए । आज उनके चेहरे पर अजीब-सी आभा थी । एक दिव्य तेज परिलक्षित हो रहा था । चाल में एक अनोखी नवीनता थी । 
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वे राजा के सामने पहुंचे और प्रणाम किया। “आज बड़े विलम्ब से पहुंचे सेन ! हमें दरबार जाने को देर हो रही थी परंतु जब तक तुम्हारे हाथ से स्नान नहीं करते अच्छा नहीं लगता ।” राजा बोले । “महाराज की महानता का मैं क्या बखान करूं । आज मैं आपको स्नान की ऐसी क्रिया से परिचित कराऊंगा कि आप प्रसन्न हो उठेंगे ।” राजा हंस पड़े । 
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तत्पश्चात सेन नाई ने उन्हें स्नान कराया शरीर पर सुगंधित तेल से मालिश की। राजा वीर सिंह को एक अलौकिक स्पर्श की अनुभूति हो रही थी । आज के स्नान और मालिश में जैसा आनंद मिला था वैसा आनन्द तो कभी नहीं मिला था । “सेन ! आज तो तुमने स्वर्गिक आनन्द दे दिया । हम इस आनन्द से बहुत प्रसन्न हैं । 
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तुम्हारे हाथों का यह स्पर्श अनोखा है । हमें ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे आज हम सेन के हाथों नहीं किसी दिव्य देव के हाथों नहाए हैं ।” “यह तो आपकी कृपा है महाराज ! जो इस तुच्छ को इस तरह सम्मान देते हैं ।” राजा उनकी प्रशंसा में जाने क्या कहे जा रहे थे । अन्तत: अपना काम समाप्त करके सेन वहां से लौट पड़े । 
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इधर जब साधु संगत को भोजन कराकर सत्संग सुनकर सेन ने उनकी विदाई की तब स्मरण आया.कि राजा प्रतीक्षा करता होगा । समय देखा तो होश उड़ गए । दोपहर हो चुकी थी । राजा बहुत क्रोध में होंगे । यह सोचकर अपनी पेटी उठाई और दौड़ चले राजभवन की तरफ । चेहरे पर भय और चाल में तेजी थी । जाने आज महाराज क्या दंड देंगे । कहीं सेवा से ही निलम्बित न कर दें । 
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राजमहल आ गया । राजद्वार पर पहुंचे तो द्वारपाल ने आश्चर्य और प्रशंसा से देखा । “क्या बात है सेन ! कुछ भूल गए क्या ?” द्वारपाल ने पूछा । ”नहीं तो ! महाराज तो बहुत क्रोध में होंगे ?” “क्रोध में क्यों ? अरे ! आज तो तुम्हारी सारे महल में प्रशंसा हो रही है । महाराज स्वयं तुम्हारी प्रशसा के गीत गाते फिर रहे हैं ।”
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‘आज खैर नहीं ।’ सेन नाई ने सोचा । “आज आपने महाराज पर क्या जादू कर दिया है जो आपके आज के कार्य से वह इतने प्रसन्न हैं ? कह रहे थे कि आज तो सेन.के हाथों में कोई-दिव्य स्पर्श था !” सेन की समझ में कुछ नहीं आ सका । वे अंदर पहुंचे और राजदरबार मे घुसे। सामने दरबार लगा था । राजा सिंहासन पर विराजमान थे और उन्हीं का नाम लेकर कोई चर्चा हो रही थी ।
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“सेन के हाथों में जादुई स्पर्श था । आज उसने आते ही कहा था कि महाराज मैं एक नए अलौकिक स्नान की विद्या सीखकर आया हूं । और ऐसा ही हुआ । कितना कोमल स्पर्श था ! जैसे रूई के फाहों से धीरे-धीरे शरीर पोंछता हो ।” तभी सेन पर राजा की दृष्टि पड़ी । राजा सिंहासन छोड़कर दौड़कर सेन के पास आए । “अरे सेन ! अभी तो तुम गए थे । क्या कोई आवश्यक कार्य पड़ गया ?”
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“महाराज ! आज विलम्ब हो गया ।” सेन ने हाथ जोड़े : “कुछ साधु मिल गए । उन के सत्संग-सत्कार में भूल गया । क्षमा चाहता हूं ।” “सेन ! तुम क्या कह रहे हो । अभी तो तुम स्नान मालिश इत्यादि करके गए हो। सेन के अंतर्कपाट खुल गए । उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया कि भक्त की आन के लिए स्वयं नाई का रूप धारण करने वाले मेरे प्रभु ही थे । अपने प्रति प्रभु का ऐसा प्रेम जानकर सेन की आखें बरस पड़ी ।
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“महाराज ! मैं तो अभी सीधा घर से आया हूँ । आप बड़े पुण्यात्मा हैं जो स्वयं श्रीभगवान के कर कमलों से स्नान किया उनके दिव्य दर्शन किए । मुझ अधम की आन के लिए उन ब्रज किशोर ने लीला रची और नाई का रूप धारण किया ।” सेन रो पड़े । सारा राज दरबार व राजा इस सत्य को जानकर आनंदित हो उठे । राजा ने सेन के चरण ही पकड़ लिए ।
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“महाभक्त सेन ! राजपरिवार सदैव के लिए आपका ऋणी हो गया । आपकी ही भक्ति से प्रसन्न होकर श्रीनारायण ने हमें दर्शन दिए और समस्त पापों का नाश किया ।” सेन प्रेम विह्वल थे । भक्त ही भगवान स्वरूप हो गए थे । सब सेन की जय-जयकार करने लगे । भगवद्कृपा का यह अनोखा उदाहरण था ।

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