शनिवार, 1 जून 2019

= *अज्ञान कसौटी का अंग ७९(३६/४०)* =

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*निरंजन निराकार है, ओंकार आकार ।*
*दादू सब रंग रूप सब, सब विधि सब विस्तार ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*अज्ञान कसौटी का अंग ७९*
सुमिरण जाकी सुरति में, सो साधन सूंघे नाँहि । 
परम तत्त्व मन में बस्या, पचहि न पंचों माँहिं ॥३७॥ 
जिनकी वृत्ति में निरंतर परब्रह्म का स्मरण रहता है, वह प्राणायामादि हठयोग के साधनों को करे तो क्या सूधंता भी नहीं, उसके मन ने तो परमात्मा बसा रहता है, वह पाँच प्राणों को वश में करने के लिये परिश्रम नहीं करता । 
शुक्र१ श्वास के बंधतैं, सुरति बँधी ता माहिं । 
ज्यों रज्जब जल हेम२ करि, शीत सु न्यारा नाँहिं ॥३८॥ 
वीर्य१ और श्वासों के बाँधने का साधन करने से वृति भी उन्ही में बँधी रहती है, जैसे जल और बर्फ२ से शीत अलग नहीं रहता, वैसे ही वृत्ति वीर्य और श्वासों से अलग न होने से परब्रह्म में नहीं जाती । 
जीव जवारे की अणी, वस्तु बूंद वपु एक । 
सुरति तिणे नहीं दोय शिर, रज्ज्ब समझ विवेक ॥३९॥ 
जौ गेहू के पीले अँकुर की अणी पर जल की एक बिन्दु ही रहती है, उस तृण के दो सिर तो होते नहीं जो दो बिन्दु रह जायें, वैस ही विवेक से समझ शरीरधारी जीव की वृत्ति में एक वस्तु ही रहेगी, वृत्ति के दो भाग तो है नहीं जो एक भाग में वीर्य व श्वास निरोध की भावना और दूसरे में ब्रह्म भावना बनी रहे, अत: वृत्ति में निरंतर ब्रह्म भावना ही रखना उत्तम है । 
अनल अंड ओले१ उडग२, अर्क३ इन्दु४ त्यों मन्न । 
रज्जब रहै सु ज्ञान गुरु, अनिल५ न अटकहि जन्न ॥४०॥ 
अनल पक्षी का अण्डा पृथ्वी पर आकर बच्चा उत्पन्न होने पर आकाश में जाकर ही रहता है पानी के कंकर१ आकाश में ही रहते हैं पृथ्वी पर वर्षने पर पानी हो जाते हैं, तारे२ चन्द्रमा३ और सूर्य४ भी आकाश में ही रहते हैं, वैसे ही साधकजन का मन गुरु के ज्ञान में ही रहता है वायु५ निरोध के साधन में नहीं अटकता । 
(क्रमशः)

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