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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू मोह संसार को, विहरै तन मन प्राण ।*
*दादू छूटै ज्ञान कर, को साधु संत सुजाण ॥*
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पंडितजी का प्रश्न .....part 1....
एक पंडितजी ने प्रश्न पूछा है ...बापूजी अविवेक क्षमा करियेगा ...आपसे 1 बात पूछनी है ...लेकिन आप कथा में मेरा नाम बोलना मत ....
बापू बोले ...मैं प्रणाम करता हूँ आप कथा में बैठे हो तो ...लेकिन आप पंडितजी हैं तो इतना व्यास्पीठ से डरते क्यूँ हैं ?...मैं कोई तलवार लेकर नहीं बैठा हूँ ...मैं तो प्यार लेकर बैठा हूँ ...आओ ना .....यदि आप मिलना चाहो तो 5 बजे अवश्य मुझे ख़ुशी होगी .....
बापू ...आप कथा में इतना बोलते हैं ...एक वस्तु का हमें व्याख्या करके बताओ ....
challenge है मेरे लिये ...अच्छा लग रहा है ....
प्रधानस्य कुलवधु वत् ....इसका अर्थ क्या होता है ?...
संस्कृत सूत्र है साहब ....मेरे ज़हन में मेरी गुरू की कृपा है ....मेरे पास इतने शास्त्र नहीं है ....गुरू कृपा से शास्त्र कृपा बहुत है ....पंडितजी मैं विनम्रता से आपका बच्चा बनके जवाब दे रहा हूँ .....
ये सूत्र सांख्यशास्त्र का है ...सीधा सादा अर्थ है प्रधान की कुलवधु की तरह ....ये कपिलाचार्य का वाक्य है ...
एक प्रधान था ...वज़ीर ...उसका 1 युवान बेटा था ..उसकी शादी हुई और प्रधान साहब की पुत्रवधु घर में आयी है ...अच्छा संसार चल रहा है ...पुत्रवधु का व्यवहार कुल में ऐसा दिखता था कि बहुत शालीन घर की बेटी है ...ससुर प्रधानजी बहुत गदगद रहते थे ...पति महोदय भी बहुत प्रसन्न रहते थे कि मुझे ऐसी पत्नी प्राप्त हुई ....
सुखद देहांत हुआ प्रधानजी का ...तसल्ली लेकर मरे कि बेटा ...बहु ....खानदानी ऐसी ...भगवत कृपा ....पदासीन हुआ बेटा ...6 मास बाप के मरने के बाद पता चला लोगों को कि ये जो प्रधान के पुत्र की स्त्री है वो ऊपर से शालीन दिखती है ...लेकिन भीतर से मर्यादाशील नहीं है ....बात पसरने लगी ....
इतने बड़े आदमी को कहे कौन ...और ये आदमी अपनी पत्नी में इतना डूबा हुआ था कि वो सुनने को राज़ी नहीं था ....उसके 2..3 पुराने मित्र उसके पास गये ...हमारा मित्र सावधान हो जाये ...जागृत हो जाये ...मित्र के नाते हमारा कर्तव्य है ....बोले ...हम य़ारों के संबंध से आपको कुछ कह सकते हैं ....माफ करियेगा ...ज़ुबान उठती नहीं ....लेकिन कहना पड़ेगा ....हमारी भाभी चरित्रवान नहीं है ....
ये क्या बोल रहे हैं आप ?...मेरी पत्नी पर आप ऊँगली उठा रहे हो ?....बात वहाँ रुक गई ...मित्रगण निकल गये ...1..2 महीने के बाद ये बात और फैलती गई ...फिर मित्रों को बड़ी पीडा हुई ...भले हमारा अपमान किया लेकिन फिर गये ....गली गली यही बात चल रही है कि कैसी स्त्री से उसने नाता जोडा....
प्रधान पुत्र को हुआ ...नहीं ....मुझे तो अंत:करण में कहीं भी ... कुछ नहीं लगता ....
जय सियारामपंडितजी का प्रश्न ...part 2.....
फिर 2 ..3 महीने बीत गये ...फिर मित्र आये ..फिर उसने कहा ....अब तीसरी बार आये हो तो चलो ...मैं कुछ मान लूँ कि कुछ गड़बड है ...लेकिन जब तक मैं प्रमाण ना पाऊँ तब तक मैं मानने को राज़ी नहीं ....
एक काम करो ...अपनी पत्नी से कहो मैं 2 दिन आवश्यक कार्य के लिये बाहर जा रहा हूँ ...तीसरे दिन आऊँगा ....
वो बाहर गया ...मित्र के घर ठहर गया ...दूसरे दिन मध्यरात्रि के समय वो मित्र बोले ...आप हमारे साथ चलेंगे ?...एक मित्र ने देखा कि कोई पुरूष रात को प्रधान पुत्र के विश्राम कक्ष में था ....पीछे की दीवार पर सीढ़ी लगा दी ...कहा कि आप चढो ....खिडकी खुली है ...आपकी पत्नी को भरोसा है कि आप 2 दिन आनेवाले नहीं हैं ....आप अपनी आँखों से देखो ....
खुली खिडकी से वो झाँकता है छिपकर ....यहाँ उसकी पत्नी अपने एक पुरूष मित्र के साथ ...खाना खा रही है ...मज़ाक कर रही है ....गीत सुन रही है ...डांस कर रही है ...कुछ अपेय पी रही है ...ऐसी अभद्र चेष्ठाओं में लीन है ....कँप गया ...गिरते गिरते बचा कि ये क्या देखा मैंने .....इतना बड़ा धोखा ...प्रधान पुत्र ने तो देख लिया ...लेकिन स्त्री खिडकी के सामने देखती है और अपने पति को देख लेती है ...ओह्ह् ....अब क्या होगा ?...
सीढ़ी से उतरते उतरते इस प्रधान पुत्र ने निर्णय कर लिया कि इस स्त्री से मेरा अब कोई संबंध नहीं ....और वो प्रधान की पुत्र वधु ने भी निर्णय कर लिया कि मुझे देख लिया है ...अब मैं सुबह होते ही यहाँ से भाग जाऊँ ....
उसको कहते हैं ....प्रधानस्य कुलवधु वत् ...........
सांख्यकार कपिलाचार्य कहते हैं ...प्रधान की पुत्रवधु है माया .....और हम सब जीव प्रधान पुत्र हैं ....और माया में भरोसा करके ...यकीन करके डूबे हुए हैं ....लेकिन कोई सज्जन लोग हमें सावधान करते हैं ...बिलग बिलग design देते हैं ....लेकिन ये माया बड़ी गुणमयी है ...
प्रधान पुत्र ने निर्णय कर लिया कि अब इससे मेरा कोई संबंध नहीं ...लेकिन माया ने भी ...प्रधान की कुलवधु ने भी देखा कि मेरा पति मुझे देख गया ...अब मैं क्या मुँह दिखाऊँ ?...अब मैं भी भाग जाऊँ ....
साहब ...हम संसार को ठीक से देख लें और हम निर्णय कर लें कि अब असंग हो जायें ....और माया भी देख ले कि इस साधक के सामने मेरी पोल खुल गई है ....इसलिये माया को छोड़नी नहीं पड़ेगी ....माया हमें छोड़कर निकल जायेगी .....
इसको कहते हैं ........प्रधानस्य कुलवधु वत् ...........
पंडितजी ....प्रणाम .......
माया को छोडो नहीं ....माया के रहस्य को पकड़ लो ....गुरूकृपा से माया हमसे भागेगी ....कि नहीं.. नहीं... इस साधु के पास जाना नहीं ...ये साधु जान गया है गुरु कृपा से .........
बापू के शब्द~मानस गुरूपूर्णिमा
जय सियाराम

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