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*जहँ तन मन का मूल है, उपजे ओंकार ।*
*अनहद सेझा शब्द का, आतम करै विचार ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*अज्ञान कसौटी का अंग ७९*
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रज्जब ओंकार के आसरे, तन मन पंचों तत्त१ ।
काचे पाकैं शब्द में, आदि अंत यहु मत्त२ ॥४१॥
जैसे तन मन और आकाशादि पंच तत्त्व१ आत्मा रूप ओंकार के आश्रय में रहते हैं, वैसे ही ब्रह्मरूप ओंकार शब्द के चिन्तन में लगकर कच्चे से पक्के बन जाते हैं, सृष्टि के आदि से अंत तक यही सिद्धान्त२ माननीय रहा है ।
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रज्जब प्रथम पंच का पेड़१ है, ओंकार ही आदि ।
अजों२ सु सीझै सुर शबद, पौन साधिये बादि ॥४२॥
सृष्टि के आदि में प्रथम आकाशादि पंच तत्त्वरों का मूल१ ओंकार ही है, अभी२ भी मंत्र रूप शब्द से देवता सिद्ध होते हैं, अत: वायु को व्यर्थ ही सिद्ध करना है, नाम चिन्तन से ही प्रभु प्राप्त हो जाते हैं ।
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सकल पसारा शब्द का, रहैं शब्द ही माँहिं ।
जन रज्जब इस पेच बिन, तन मन बंधन नाँहि ॥४३॥
सभी शब्द का फैलाव है, शब्द में ही सब रहते हैं, इस शब्द के फंदे१ बिना वायु बाँधने से तन मनादि नहीं बँध सकते अर्थात नाम चिन्तन करने से ही तन मन और इन्द्रिय संयम से रहती है ।
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ओंकार आतमा शबद, कथा नीति निर्वृत्ति१ ।
रज्जब पंचों पीठ दें, पहुंतै२ जीव प्रवृति ॥४४॥
ओंकार, चिन्तन, आत्मा विचार, गुरु शब्द, नीति कथा, मुक्ति१ संबन्धी कथा, इन पाँचों को पीठ देता है तब जीव संसार- प्रवृति में प्रविष्ट२ होता है ।
(क्रमशः)

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