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*राम विमुख जुग जुग दुखी, लख चौरासी जीव ।*
*जामै मरै जग आवटै, राखणहारा पीव ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*उपदेश चेतावनी का अंग ८२*
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पारस पौरस कल्पतर, कामद धेनु कहात ।
मनुष्य देह माधव मिलत, महिमा कही न जात ॥३३॥
मनुष्य देह पारस, पौरसा(सोना देने वाला मनुष्याकार सुवर्ण का पुतला) कल्पवृक्ष और कामधेनु कहलाता है, किन्तु पारसादि से भी यह अधिक है, उनसे तो भगवान नहीं मिलते और इससे भगवान् भी प्राप्त होते हैं । अत: इसकी महिमा पूर्ण रूप से नहीं कही जा सकती ।
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मनुष्य देह माया मई, धर्या१ अधर बिच२ धन्न ।
इहिं छूट्यों छूटे उभय, समझैं समझे जन्न ॥३४॥
मनुष्य देह मायामय तो है ही, इसके बीच में साक्षी ब्रह्मरूप१ धन भी धरा२ है, इसके छूटने से माया और ब्रह्म दोनों ही छूट जाते हैं, इस रहस्यमय बात को समझे हुये महानुभाव संतजन ही समझते हैं, अन्य नहीं ।
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काया कागद पर लिखे, ब्रह्म विलायत१ माँहिं ।
रज्जब पिंडे पटे२ पड़्यूं, दर्श दिशावर३ नाँहिं ॥३५॥
जैसे कागज पर देश१ प्रदान रूप वार्ता लिखी होती है, वैसे ही मनुष्य शरीर में ब्रह्म प्राप्त होना लिखा है । अधिकार-पत्र२ खोया जाय तो देश३ नहीं मिलता, वैसे ही प्रमादवश विषयों में मनुष्य देह खो दिया जाय तो ब्रह्म नहीं मिलता ।
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हानि न मिनखा देह सम, जब जीव कने१ सौं जाय ।
भजन विमख भंजन२ मिलहिं, चौरासी निरताय३ ॥३६॥
विचार३ करो, यदि जीव के पास१ से मनुष्य देह चला जाय तो इसके समान कोई हानि नहीं हैं यही सबसे बड़ी हानि है । भगवद् भजन से विमुख प्राणी मनुष्य देह को नष्ट२ करके चौरासी लाख योनियों में ही मिलता है ।
(क्रमशः)

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