बुधवार, 5 जून 2019

= *अज्ञान कसौटी का अंग ७९(५३/५६)* =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷

🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*काया माँही नाद कुरंग, काया माँही ज्योति पतंग ।*
*काया माँही चातक मोर, काया माँही चंद चकोर ॥* 
*काया माँही प्रीति कर, काया माँही सनेह ।*
*काया माँही प्रेम रस, दादू गुरुमुख येह ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*अज्ञान कसौटी का अंग ७९* 
मदन बीज मस्तक रहै, कहीं न ठाहर और । 
तो रज्जब सुत अंग में, क्यों निपजै सब ठौर ॥५३॥ 
काम और वीर्य अन्य किसी स्थान में रहकर मस्तक में ही रहते हैं तो शरीर में पुत्र क्यों उत्पन्न होता है ? अर्थात गर्भाशय में वीर्य जाता है तभी पुत्र होता है, अत: काम और वीर्य शरीर में सभी जगह रहते हैं । 
वीरज१ बीबा२ चित्र का, अर्भक३ अंबर४ भांति । 
रज्जब उनमें नुक्स५ है, प्रगटे सो ही कांति६ ॥५४॥ 
चित्र छापने का ब्लाक२ जैसा होता है, वही छवि६ वस्त्र४ पर प्रकट होती है, ब्लाक में दोष हो तो चित्र में दोष५ आता है, वैसे ही जैसा वीर्य१ होता है, वैसे ही गुण-दोष बालक३ में आते हैं वह वीर्य सभी शरीर में रहता है । 
किस नाड़ी में बसत हैं, किस नाड़ी में नाँहिं । 
रोम रोम में रम रह्या, रज्जब नख शिख माँहिं ॥५५॥ 
वीर्य किस नाड़ी में बसता है और किसमे नहीं बसता, यह नहीं कहा जा सकता, वह तो नख से लेकर शिख तक सब शरीर में रोम रोम में ही रमा रहता है । 
स्वरमंडल१ सु शरीर यहु, रज्जब रग सब तार । 
उभय१ राग में एक ह्वै, माया ब्रह्म विचार ॥५६॥ 
यह शरीर ही तार-वाद्य१ है । इसकी सब रग ही तार है । जैसे स्वर मंडल से राग निकलती है, वैसे ही शरीर में राग निकलती है, स्वर मंडल और शरीर दोनों२ ही रागों में एक ही विचार होता है । अज्ञानी की राग माया का और ज्ञानी की राग में ब्रह्म का । अज्ञानी मायिक विचार से कष्ट उठाता है । ज्ञानी ब्रह्म विचार से ब्रह्मानन्द प्राप्त करता है । 
(क्रमशः)

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