मंगलवार, 4 जून 2019

= सुन्दर पदावली(२२. राग सारंग - १३) =

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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
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*पहली हम होते छोकरा ।* 
*ब्रह्म बिचार बनिज हम कीयौ*
*ताही तैं भये डोकरा ॥(टेक)*
*भली बस्तु संचय करि राषी*
*लेनें आवै लोकरा ।*
*यह उधारि कौं सोदा नाहीं*
*दीजे लीजे रोकरा ॥१॥*
*जो कोइ गाहक लेत प्यार सौं*
*ताकौ भागै सोकरा ।*
*सुन्दर बस्तु सत्य यह यौंही*
*और बात सब फोकरा ॥२॥* 
पहले हम कुसंगति के कारण अज्ञान से लिप्त थे, बच्चे(अज्ञानी बालक) थे, परन्तु जब से हमने यह ‘ब्रह्म विचार’ रूप व्यापार आरम्भ किया तबसे हम ‘ज्ञान वृद्ध’(डोकरा) कहलाने लगे ॥टेक॥ 
अब हमने लोकोत्तर(भली) वस्तु(ज्ञान) का संग्रह आरम्भ किया तो लोग हमारे पास उसको लेने के लिये आने लगे । हमने उनको स्पष्ट कह दिया कि यह व्यापार उधार में नहीं किया जा सकता । यह तो ‘इस हाथ दे उस हाथ ले’ का नकद व्यापार है ॥१॥ 
जो ग्राहक इसे प्रेम से लेगा उसके सांसारिक शोक सन्ताप नष्ट हो जाते हैं । महात्मा श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं – संसार में यही एक वस्तु सत्य है, अन्य सब मिथ्या(फोक) हैं ॥२॥
(क्रमशः)

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