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*बार बार यह तन नहीं, नर नारायण देह ।*
*दादू बहुरि न पाइये, जन्म अमोलिक येह ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*उपदेश चेतावनी का अंग ८२*
इस अंग में उपदेश द्वारा सचेत कर रहे हैं ~
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रज्जब कीजे बंदगी, जेती जीव सौं होय ।
जो साहिब सौंपी नहीं, ता सौं बल नहिं कोय ॥१॥
जितनी जीव से हो सके उतनी प्रभु की सेवा भक्ति अवश्य करना चाहिये और जो जीव से नहीं होती, उसके करने की शक्ति तो ईश्वर ने दी ही नहीं, अत: उसके करने के लिये शास्त्र-संत भी कोई ओर नहीं देते ।
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मिनखा१ देही दिन उदय, जन रज्जब भज तात ।
चौरासी लख जीव की, देही दीरघ रात ॥२॥
चौरासी लाख जीवों के शरीर तो महान् रात्रि के समान है और मनुष्य देह सूर्यदेव के समान हैं, अत: मनुष्य१ देह प्राप्त करके परमपिता प्रभु का भजन अवश्य करना चाहिये ।
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वित२ उपर बीती१ पड़ी, नर नारायण देह ।
जन रज्जब जगदीश भज, जन्म सफल कर लेह ॥३॥
नारायण को प्राप्त करने के साधन रूप धन२ की सीमा१ नर देह पर आ पड़ी है, अर्थात प्रभु प्राप्ति के साधन करने के लिये नर देह से श्रेष्ठ और कोई देह नहीं है अत: जगदीश्वर का भजन करके जन्म सफल करो ।
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रे प्राणी पासा पङ्या, मिनखा देही माँहिं ।
जन रज्जब जगदीश भज, यहु अवसर भी नाँहिं ॥४॥
जैसे जुआ के खेल में अनुकूल पासा पड़ता है, वैसे ही हे प्राणी ! मनुष्य शरीर में तुझे प्रभु-भजन की अनुकूलता मिली है, अत: शीघ्र जगदीश्वर का भजन कर, देर करने से यह मनुष्य देह का समय भी नहीं रहेगा, समाप्त हो जायगा ।
(क्रमशः)

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