#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*बेली का अँग ३६*
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दादू अमर बेलि है आतमा, खार समँदाँ माँहिं ।
सूखे खारे नीर सौं, अमर फल लागे नाँहिं ॥१०॥
यद्यपि जीवात्मा रूप बेलि अमर है, तो भी सँसार रूप क्षार समुद्र में अनित्यता रूप क्षार से युक्त विषय - जल से भ्रम रूप शुष्कता आ जाती है । "मैं अमर हूं” यह ज्ञान नहीं रहता और सँशय के कारण अमरता का ज्ञान कराने वाला ब्रह्म - ज्ञान रूप फल भी नहीं लगता ।
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दादू बहु गुणवन्ती बेलि है, ऊगी कालर माँहिं ।
सींचे खारे नीर सौं, तातैं निपजे नाँहिं ॥११॥
जीवात्मा रूप बेलि बहुत - से दैवी गुणों से युक्त है किन्तु कुसंग रूप ऊसर भूमि में उत्पन्न होने और विषय रूप खारे जल से सींचने से इसके भक्ति - ज्ञान रूप फूल - फल नहीं लगते ।
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बहु गुणवन्ती बेलि है, मीठी धरती बाहि ।
मीठा पानी सींचिये, दादू अमर फल खाहि ॥१२॥
जीवात्मा - बेलि बहुत - से दैवीगुणों से युक्त है, इसे सत्संग रूप मधुर उर्वर भूमि में लगाकर भगवत्प्राप्ति के साधन रूप भक्ति मधुर जल से सींचो और इसके ज्ञान रूप अमर फल को खाकर अमर हो जाओ ।
(क्रमशः)

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