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*सहजैं ही सब होइगा, गुण इन्द्रिय का नास ।*
*दादू राम संभालतां, कटैं कर्म के पास ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*अज्ञान कसौटी का अंग ७९*
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काया तरुवर नीम का, जीव जल युक्ति सु माँहिं ।
रज्जब रग डालों फिर्यों, निर्मल मीठे नाँहिं ॥५७॥
नीम के वृक्ष में जल रहता है, वह उसकी डालियों में फिर फिर के देखने से भी मीठा नहीं मिलेगा, उसी युक्ति से शरीर में जीव रहता है, शरीर की रग रग में देखने से भी निर्मल नहीं मिलेगा, जैसा है वैसा ही मिलेगा ।
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वपु वसुधा१ वनराई२ तैं, आतम अंभ३ नि कास ।
रज्जब सुमिरण सूर सौं, स्वाद रूप गुण नाश ॥५८॥
पृथ्वी१ की वन-पंक्तियों२ से सूर्य द्वारा जल३ निकलता है तब स्वाद और रंग - रूप नाश हो जाते हैं, वैसे ही शरीर में स्थिर आत्मा प्रभु नाम - स्मरण द्वारा शरीर से निकलता है तब गुण नाश हो जाता है ।
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सरवर सौं सूखै कमल, उलझन भौंरा मन्न ।
साधन परै बताइया, नाम निरंतर धन्न ॥५९॥
हे मन रुप भ्रमर ! शरीर रूप सरोवर से प्राण निरोधादि हठ योग की क्रिया रूप साधन-कमल सूख जाता है अर्थात रोगी होने पर साधन छूट जाता है, अत: उस में मत फँस, किन्तु उस साधन से परे नाम रूप धन बताया है, वह निरंतर रहता है, रोगी होने पर भी मन से होता रहता है अत: निरंतर नाम स्मरण कर ।
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नाड़ी चक्र सु पिंड में, प्राण१ मध्य नहिं शोध ।
रज्जब जाणा जीव परै, यह गहि उत्तम बोध ॥६०॥
नाड़ी और चक्र शरीर में है, प्राणी१ में तो नहीं है, हमने खोज करके जीव को नाड़ी चक्रादि से परे ही जाना है, यह उत्तम ज्ञान ग्रहण कर, अज्ञान पूर्ण साधन में समय मत खो ।
(क्रमशः)

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