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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*पहली हम होते छोहरा ।*
*कौडी बेच पेट निठि भरते*
*अब तौ हूये बोहरा ॥(टेक)*
*दे इकोतरासई सबनि कौं*
*ताही तें भये सोहरा ।*
*ऊंचौ महल रच्यौ अबिनाशी*
*तज्यौ परायौ नौहरा ॥१॥*
*हीरा लाल जवाहिर घर मैं*
*मानिक मोती चौहरा ।*
*कौंन बात की कमी हमारै*
*भरि भरि राषै भौंहरा ॥२॥*
*आगै बिपति सही बहुतेरी*
*वै दिन काटे दोहरा ।*
*सुन्दरदास आस सब पूगी*
*मिलियौ राम मनोहरा ॥३॥*
पहले हम अज्ञानी(छोहरा=बच्चा) थे । कोडी कोडी का माल बेच कर जीवन निर्वाह करते थे । अब तो हम थोक माल बेचते हैं, अतः बोहरा(बड़े व्यापारी) कहलाते हैं ॥टेक॥
हम दी हुई शुद्ध रकम पर एक रुपया सैकड़ा ब्याज लेते हैं । अब बाजार में हमारी प्रसिद्धि हो गयी है । अब हमने अपने अविनासी व्यापार के लिये स्वतन्त्र हवेली(प्रासाद=महल) बना ली है । पहले हम जिस नौहरा(किराये के मकान) में रहते थे वह छोड़ दिया है ॥१॥
अब हमारे घर में हीरा, लाल, जवाहर, रत्न, माणिक्य, मोतियों की पिरोयी हुई चौहरी माला आदि सब कुछ है । किसी वस्तु की कोई कमी नहीं है । उन वस्तुओं से हमने अपना घर भर रखा है ॥२॥
पहले हमने अर्थाभाव में बहुत कष्ट सहे वे दिन हमने बहुत कठिनता से बिताये हैं । महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - अब मेरी सभी आशाएँ(इच्छाएँ) पूर्ण हो चुकी है; क्योंकि अब मुझे भगवत्साक्षात्कार हो चुका है ॥३॥
(क्रमशः)

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