मंगलवार, 11 जून 2019

= साक्षीभूत का अँग ३५(१३-१५) =

#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*साक्षीभूत का अँग ३५*
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केई सेवक ह्वै रहे, केई साधु संगति माँहिं ।
केई आइ दर्शन करैं, हम तैं होता नाँहिं ॥१३॥
और कितने ही सेवक बन कर रहते हैं, साधु संगति में आते हैं, नियम से प्रतिदिन आकर दर्शन करते हैं । किन्तु ये सब कर्म, स्वयँ को अकर्त्ता समझने वाले साक्षी रूप सँत से नहीं होते । कारण, इन सबका फल - ज्ञान उन्हें प्राप्त है, अत: वे निरन्तर ब्रह्म - चिन्तन में ही रत रहते हैं ।
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ना हम करैं करावैं आरती, ना हम पिवैं पिलावैं नीर ।
करे करावै साँइयां, दादू सकल शरीर ॥१४॥
न तो हम आरती करते हैं और न कराते हैं । न हम चरणोदक पीते हैं और न पिलाते हैं, किन्तु ये सब तो सँपूर्ण शरीरों में आत्म रूप से स्थित परमात्मा ही प्रेरणा द्वारा करते कराते हैं ।
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करै करावै साँइयां, जिन दीया औजूद ।
दादू बन्दा बीच मैं, शोभा को मौजेद ॥१५॥
जिन परमात्मा ने शरीर दिया है, वे ही लोक - कल्याणादि सब कुछ कार्य करते कराते हैं । सँत रूपी दास तो कार्य करवाने के मध्य में साक्षी रूप से शोभा के लिए ही उपस्थित रहता है ।
(क्रमशः)

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