#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*करम हिंडोलना झूलत सब संसार ।*
*है हिंडोल अनादि कौ
यह फिरत बारम्बार ॥(टेक)*
*दोइ षम्भ सुष दुःख अडिग
रोपे भूमि माया मांहिं ।*
*मिथ्यात ममता कुमति कुदया,
चारि डांडी आहिं ॥*
*पाप पटली पुन्य मरवा,
अधो ऊरध जांहिं ।*
*सत्व रज तम देहिं झोटा,
सूत्र षैंचि झुलाहिं ॥१॥*
कर्महिं डोला : यह समस्त संसार अपने कर्महिंडोले में झूल रहा है । यह हिंडोला अनादि काल से चला आ रहा है और रह रह कर यहीं घूम रहा है ॥टेक॥
इसके सुख एवं दुःख दो अडिग स्तम्भ हैं । सांसारिक माया इसकी भूमि है । असत्य, ममता, दुर्बुद्धि एवं निर्दयता – ये चार इसके दण्ड हैं । पाप इसकी पटली एवं पुष्प मरवा – ये ऊपर नीचे आते जाते रहते हैं । सत्त्व, रज एवं तम – ये तीनों दोष झोटा देकर इस झूले को झुलाते रहते हैं ॥१॥
(क्रमशः)

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