गुरुवार, 20 जून 2019

= *उपदेश चेतावनी का अंग ८२(१३/१६)* =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷 
*सांई दीया दत घणां, तिसका वार न पार ।*
*दादू पाया राम धन, भाव भक्ति दीदार ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
*उपदेश चेतावनी का अंग ८२* 
देणा था सो सब दिया, जब दी मिनखा देह । 
सब सुकृत की सौंज१ यहु, हरि सुमिरण कर लेह ॥१३॥ 
जब मनुष्य शरीर दे दिया है तब जो देना था सो सब दे दिया है, यह मनुष्य शरीर सभी पुण्य कर्मों के करने की साधना सामग्री१ है, इसमें हरि-स्मरण करके हरि को प्राप्त कर । 
सत जत सुमिरण को दई, मिनखा देही जानि । 
जन रज्जब जग योनि बहु, इन तिहुं थोकों हानि ॥१४॥ 
सत्य भाषण, ब्रह्मचर्य, हरि स्मरण, इन तीनों साधनों के करने के लिये ही मनुष्य शरीर दिया है । जगत में ज्ञानी तो बहुत हैं किन्तु इन सत, जत, और हरिस्मरण रूप तीनों थोकों से रहित है । 
रज्जब नर हरि मिलण को, मिनखा देही ठौर । 
चौरासी तन चाहतों, ऐसी मिले न और ॥१५॥ 
मनुष्य देह ही भगवान् से मिलने योग्य स्थान है, चौरासी लाख योनियों में तो चाहने पर भी ऐसी देह अन्य नहीं मिल सकती । 
सांई अपणी सौंज१ को, कीन्हा आदम२ ठाट३ । 
रज्जब जीव जाणे नहीं, भूला निपट निराट४ ॥१६॥ 
प्रभु ने अपने स्वरूप को प्राप्त करने की सामग्री१ संपादन करने के लिये ही मनुष्य२ शरीर३ उत्पन्न किया है किन्तु जीव इस बात को नहीं जानता, प्रभु के संपूर्ण४ उपकार को बिलकुल भूल गया है ।
(क्रमशः)

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