#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
*अबिहड़ का अँग ३७*
बेली - अँग के अनन्तर जिसका सदा सँयोग रहता है, उस एकरस अद्वैत अविनाशी ब्रह्म - तत्व के विचार “अबिहड़ का अँग” निरूपण करने में प्रवृत्त हुये मँगल कर रहे हैं -
.
दादू नमो नमो निरंजनँ, नमस्कार गुरुदेवत: ।
वन्दनँ सर्व साधवा, प्रणामँ पारँगत: ॥१॥
जिनकी कृपा से साधक अज्ञान से पार हो, ब्रह्म के नित्य सँयोग को समझ कर ब्रह्मरूप ही हो जाता है, उन निरंजन राम, सद्गुरु और सर्व सँतों को हम अनेक प्रणाम करते हैं ।
.
दादू संगी सोई कीजिये, जे कलि अजरावर होइ ।
ना वह मरै न बीछुटे, ना दुख व्यापे कोइ ॥२॥
२ - ५ में सदा एकरस रहने वाले परमात्मा को ही अपना साथी बनाने की प्रेरणा कर रहे हैं - जो सँसार में देवताओं से भी अति श्रेष्ठ है, न मरता है, न किसी से बिछुड़ता है और न ही जिसको कोई दु:ख होता है, उसी परमात्मा को अपना साथी बनाओ ।
.
दादू संगी सोई कीजिये, जे थिर इहिं सँसार ।
ना वह खिरै१ न हम खपैं२, ऐसा लेहु विचार ॥३॥
जो इस सँसार में सदा सम्यक् स्थिर रहता है, कभी भी अपनी स्थिति से क्षय१ होकरनहीं गिरता और जिसको साथी बनाकर हम भी नष्ट२ नहीं हों, विचार करने पर जो ऐसा सिद्ध हो, उसी को अपना साथी बनाओ ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें