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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*जे तू चाहै राम को, तो एक मना आराध ।*
*दादू दूजा दूर कर, मन इन्द्री कर साध ॥*
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साभार ~ Tiwari Harshdev Shashtri
"तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।
जब लगि भजत न राम कहुँ शोकधाम तजि काम॥"
विभीषण ने बड़े सुंदर सूत्र दिए हैं, जीवन में उतारने योग्य हैं। जीव को तबतक न कुशलता है, न सपने में भी मन को विश्राम ही है, जब तक वह दुखों के घर कामनाओं को छोड़कर, भगवान को नहीं भजता। मन में लोभादि विकार तभी तक बसते हैं, जब तक भगवान हृदय में नहीं उतर आते।
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भगवान रूपी सूर्य प्रकट हुए बिना, ममता रूपी रात्रि कैसे नष्ट हो? त्रितापों से छुटकारा कैसे हो?
कहनेवाले कहते हैं कि भगवान तो कण कण में हैं ही, हृदयदेश में हैं ही, तब वे स्वयं ही विकारों को नष्ट क्यों नहीं कर देते। अरे भाई ! हवा तो सब जगह है, फिर पंखा क्यों लगाते हो? परमात्मा हृदयस्थ तो है, पर उसका लाभ तभी मिलता है जब मन में सगुन साकार की इष्ट निष्ठा का पंखा लग जाए।
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संकट यह है कि सामान्यत: भगवान का स्मरण हृदय में टिकता नहीं, चलते फिरते की तो बात ही छोड़ दें, बैठ कर भी प्रयास करें तो भी छूट छूट जाता है। तब क्या करें?
इसका सरल उपाय स्वयं भगवान ने बताया है। देखें, एक रस्सी है, जिससे भगवान बंध जाते हैं, ऐसे बंध जाते हैं, कि फिर आप भी छोड़ना चाहें तो भगवान नहीं छोड़ने देते। और वह रस्सी कहीं बाहर से नहीं लानी है, वह तो हम जन्म से ही साथ लेकर आते हैं।
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पर हमने उस रस्सी का धागा धागा अलग कर, उनसे संसार के व्यक्तियों और वस्तुओं को बाँध रखा है। और उन्हें बाँधने के चक्कर में हम स्वयं ही उन धागों में ऐसे उलझ गए हैं कि हमारा जीना ही मुश्किल हो गया है।
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अब करना क्या है? कुछ विशेष नहीं करना। बस उन धागे को उन उन व्यक्तियों और वस्तुओं से खोल कर, उनकी पुनः एक मोटी रस्सी बनानी है, और फिर कसकर उसे भगवान के चरणों से बाँध देना है।
वह रस्सी, आपके प्रेम की रस्सी है, ममता की रस्सी है। यही है-
"सबकी ममता ताग बटोरी।
मम् पद मनहिं बांधि बर डोरी॥"
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वही प्रेम जो आपने संसार में लगा रखा है, संसार से हटाकर भगवान के चरणों में लगाना है, इससे अधिक भगवान कुछ नहीं चाहते। इसीको गीता में भगवान इस प्रकार कहते हैं-
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:।।"
🌹🙏मंगल सुप्रभात🙏🌹
🌹🙏जय जय श्री राधे🙏🌹
💕💕💕💕💕💕💕💕💕💕साभार

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