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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*पहलैं आगि बरै हुती हो,*
*पूला नाष्यौ आइ ।*
*रोगी कौं रोगी मिलै तौ,*
*ब्याधि कहां तैं जाइ ॥३॥*
*माया ऐसी मोहनी हो,*
*मोहे हैं सब कोइ ।*
*ब्रह्मा बिष्णु महेस की हो,*
*घर घरनी भइ सोइ ॥४॥*
*चन्दवदन मृगलोचनी हो,*
*कहत सकल संसार ।*
*कामिनि बिष की बेलडी हो,*
*नष शिष भरी बिकार ॥५॥*
अग्नि जहाँ जलना आरम्भ हुई थी कि उसमें घास का एक पूला(तृण राशि) उस पर डाल दिया । अरे भाई किसी रोगी को रोगवर्धक वस्तुएँ उपलब्ध होती रहें तो उसका रोग कैसे शान्त हो सकता है ॥३॥
यह माया ऐसी मोहनी है कि इसने समय आने पर सभी को मुग्ध कर लिया । इसने ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वर को भो नहीं छोड़ा । उन पर भी डोरा डाल कर समय आने पर उनकी पत्नी बन गयी ॥४॥
भले ही समस्त संसार इस माया को ‘चन्द्रवदनि, मृगलोचनि’ कहता रहे, परन्तु वस्तुतः है यह एक कामिनी के रूप में विषलता, जो कि नख से शिखा तक दोषों से परिपूर्ण है ॥५॥
(क्रमशः)

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