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*दादू राम कहे सब रहत है, जीव ब्रह्म की लार ।*
*राम कहे बिन जात है, रे मन हो होशियार ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*अज्ञान कसौटी का अंग ७९*
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साधन सूने१ साधना, आतम ह्वै अनि२ आश ।
जन रज्जब ता जीव के, नाम नहीं विश्वास ॥६९॥
नाम चिन्तन से शून्य१ साधना करने वाले जीव का नाम पर विश्वास नहीं होता, इसलिये वह प्रभु परायण तो होता नहीं, उस जीवत्मा के हृदय में अन्य२ की ही आशा होती है ।
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निश्चै१ नाहीं नाम परि, जे कष्ट आदरहिं और ।
सूने२ साधन में पर्या, लहै न ठाँवी ठौर४ ॥७०॥
जो अन्य कष्टों का आदर करता है, उसका प्रभु नाम में विश्वास१ नहीं होता, इसी शान्ति-शून्य२ साधन में पड़ जाता है और अपने घर३ के स्थान४ रूप ब्रह्म को नहीं प्राप्त होता है ।
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देही देशों में पड़्या, कर्म कु लक्षण काल ।
नाम नाज नर घर नहीं, प्राणहुं की प्रतिपाल ॥७१॥
देश में काल पड़ जाता है तब घर में नाज नहीं होने से प्राणों की रक्षा होना कठिन हो जाता है, वैसे ही देह में कुकर्म और कुलक्षण आ जाते है तब उस नर के अत:करण में प्रभु का नाम चिन्तन नहीं हो तो काल से प्राणी की रक्षा करना कठिन हो जाता है ।
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कपट कसौटी ठग विद्या, आपै१ भरी उपाधि ।
कायर शूरा सूम ठग, भम्रि भम्रि काया साधि ॥७२॥
कपट से कष्ट उठाना ठग विद्या है, अहंकर१ से यह कपट रूप उपाधि उनके मन में भरी रहती है, ऐसे नर कायर होकर भी शूर से बने रहते हैं, कृपण और ठग होकर भी उदार-से रहते हैं और शरीर साधने के लिये भ्रम भ्रमकर कष्ट उठाते हैं ।
(क्रमशः)

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