रविवार, 9 जून 2019

= साक्षीभूत का अँग ३५(७-९) =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*साक्षीभूत का अँग ३५*
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*स्वकीय मित्र - शत्रुता*
दादू जामन मरणा सान१ कर, यहु पिंड उपाया ।
सांई दीया जीव को, ले जग में आया ॥७॥
७ - १० में अपनी ही बनाई हुई मित्रता तथा शत्रुता का परिचय दे रहे हैं, जन्म - मरण से युक्त१ करके यह शरीर बना कर भगवान् ने जीव को प्रदान किया है । जीव इसे लेकर सँसार में आया है और अपने भेद व्यवहार द्वारा इस ने मित्रता - शत्रुता खड़ी कर ली है ।
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विष अमृत सब पावक पाणी, सतगुरु समझाया ।
मनसा वाचा कर्मणा, सोई फल पाया ॥८॥
सद्गुरु ने जीवों को समझा दिया था, विषयासक्ति विष है, ब्रह्म - ज्ञान अमृत है, आसुरी गुण अग्नि है, दैवी गुण जल है, फिर तो जीव मन, वचन, कर्म से जिसमें संलग्न हुआ, उसे वैसा ही फल मिला अर्थात् विषयासक्ति विष से बारम्बार मृत्यु, ज्ञानामृत से ब्रह्म प्राप्ति रूप अमरता, आसुरी गुण - अग्नि से हृदय दाह और दैवी गुण - जल से हृदय में स्वच्छता, शीतलता रूप फल प्राप्त किया ।
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दादू जानै बूझै जीव सब, गुण औगुण कीजे ।
जान बूझ पावक पड़ै, दई दोष न दीजै ॥९॥
जीव गुण - अवगुणादि सब को जानता है और उनमें संलग्न होने के परिणाम को भी समझता है, किन्तु जान - बूझकर भी अवगुण रूप अग्नि में ही गिरता है, तब दैव को क्या दोष दिया जाय ! यह तो आप ही अपना शत्रु - मित्र बनता है ।
(क्रमशः)

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