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*'सुन्दर' नफो न वस्तु में, नफो भाव में होय ।*
*भाव बिहूना प्राणियाँ, बैठा पूंजी खोय ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*सेवा निष्फल का अंग ८०*
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भाव अभाव ग्राही गोविन्द, आगै मुर१ विधि छान२ ।
समझ भोल भूल हरि भासें, दाता दे त्यों दान ॥५॥
गोविन्द भाव तथा अभाव से दोनों प्रकार ही ग्रहण करते हैं किन्तु आगे अनुसंधान२ करने से ग्रहण करने वाले हरि तीन१ प्रकार से भासते हैं, दाता समझ से, भोलेपन से और भूल से जैसे ही दान देते हैं वैसे ही लेते हैं ।
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रज्जब सन्मुख१ विमुख२ की, शक्ति३ सृष्टि धर लेहिं ।
विलोक विभीषण रावणहिं, देखो क्या क्या देहिं ॥६॥
सृष्टि को धारण करने वाले प्रभु भक्त और अभक्त दोनों का ही धन लेते हैं, देखो, विभीषण और रावण को, राम ने धन दोनों का ही लिया किन्तु भक्त विभीषण को क्या दिया ? लंका, और अभक्त रावण को क्या दिया कुल सहित नष्ट कर दिया ।
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नीर पड़हिं नौ खण्ड परि, जाहि सु सूर१ समंद ।
सगुण सेय निगुर्ण मिलहिं, अइया२ मुहकम३ बंध ॥७॥
पृथ्वी के नौ खंड में जल वर्षता है, वह सूर्य१ तथा समुद्र में जाता है, वैसे ही जीव सगुण की सेवा करके निर्गुण से मिलता है यही२ दृढ३ बंधान बंधा हुआ है ।
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सब दिशी शीश नवाइये, मस्तक मांटी मेल ।
त्यों धोक धरे१ की अधरहि२ लागे, रज्जब अज्जब खेल ॥८॥
सभी दिशाओं में पृथ्वी पर शिर नमा कर देखो, मिट्टी से ही मिलेगा, वैसे ही देवी१ देवता आदि किसी को भी नमस्कार करो ब्रह्म२ को ही होगा, यह अद्भुत खेल है ।
(क्रमशः)

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