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॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*साक्षीभूत का अँग ३५*
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देवे लेवे सब करे, जिन सिरजे सब लोइ१ ।
दादू बन्दा महल में, शोभा करैं सब कोइ ॥१६॥
जिन परमात्मा ने सब लोगों१ को रचा है, वही परमात्मा सबको अनुकूलता देते हैं, प्रतिकूलता अपहरण करते हैं । सन्त तो समाधि महल में परब्रह्म - परायण रह कर साक्षी रूप से ही रहता है, तो भी लोग अपने सुख का निमित्त उसे ही मानकर उसकी शोभा करते हैं ।
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*कर्ता साक्षी - भूत*
दादू जुवा खेले जाणराइ, ताको लखै न कोइ ।
सब जग बैठा जीत कर, काहू लिप्त न होइ ॥१७॥
इति साक्षीभूत का अँग समाप्त: ॥३५॥सा - २५००॥
कर्त्ता की साक्षीरूपता दिखा रहे हैं, सँपूर्ण ज्ञानियों से श्रेष्ठ सर्वज्ञ परमात्मा सँसार की उत्पत्ति, पालन, प्रलय रूप जुआ का खेल खेल रहा है, किन्तु खेल के साधन रूप सँसारी जीवों में से उसे कोई भी नहीं देख पाता । वह लाभ - हानि के हर्ष - शोकादिक किसी भी गुण से लिप्त नहीं होता और सब जगत् को अपने अधीन करके अपनी महिमा में स्थित है ।
इति श्रीदादू गिरार्थ प्रकाशिका साक्षीभूत का अँग समाप्त: ॥३५॥
(क्रमशः)

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