रविवार, 14 जुलाई 2019

= *उपदेश चेतावनी का अंग ८२(९३-९६)* =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷

🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷 
*जहाँ थैं मन उठ चलै, फेरि तहाँ ही राखि ।*
*तहँ दादू लै लीन कर, साध कहैं गुरु साखि ॥*
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
*उपदेश चेतावनी का अंग ८२*
रज्जब रीझ्या ठौर किहिं, जहाँ जगत की मीच । 
चेत चमक लागे नहीं, बैठा रह्या क्यों नीच ॥९३॥ 
जहां जगत के प्राणियों की मृत्यु होती है, वहां संसार में ही तू किस विषय रूप स्थान पर रीझ रहा है ? हे नीच ! क्यों बैठा हुआ है, सावधान हो जिससे दु:ख रूप चोट न लगे । 
रज्जब मरणा मुंह आगे खड़ा, बूढे को तु विशेख । 
अब तासौं कहु क्या कहैं, रे अंधा कछु देख ॥९४॥ 
मृत्यु मुँह आगे खड़ा है और वृद्धा को तो विशेष रूप से आ धेरा है, अरे अंधे ! कुछ देख तो सही, और कह अब इससे अधिक तेरे को क्या कहा जाय ? 
काया कुंभ जल सौं भर्या, ज्ञान तेल भरिपूर । 
मारुत बाती शब्द उजाला, अचेत तिमिर ह्वै दूर ॥९५॥ 
काया रूप घड़े में विषय-वासना रूप जल भरा है, उसे निकाल कर उसमें विवेक ज्ञान रूप तेल परिपूर्ण रूप से भरो, तब श्वास रूपी बत्ती से शब्द प्रकाश होगा अर्थात नाभि में ओंकार ध्वनि प्रकट होगी, उससे एकाग्रता की वृद्धि होकर आत्म-ज्ञान द्वारा अज्ञान रूप अंधकार दूर हो जायेगा । 
दशों दिशा मन फेर करि, जहाँ उठै तहँ राखि । 
जन रज्जब जगपति मिलैं, सद् गुरु साधू साखि ॥९६॥ 
दसों दिशाओं से मन को लौटा कर जहाँ से उठता है वहाँ ही रक्खो, इस साधना से जगदीश्वर मिल जायेंगे इसमें सद् गुरु और संतों की साक्षी है । 
(क्रमशः)

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