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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*राम बिना किस काम का, नहीं कौड़ी का जीव ।*
*सांई सरीखा ह्वै गया, दादू परसै पीव ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*उपदेश चेतावनी का अंग ८२*
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विभूति१ भूत२ बहु विधि बध्या, चकहु३ चक्कवै४ राज ।
भजन विमुख विद्या सभी, सो रज्जब किहिं काज ॥१५३॥
ऐश्वर्य१ के द्वारा प्राणी२ बहुत प्रकार से बढ़ता है तो पृथ्वी३ का चक्रवर्ती४ राजा हो जाता है किन्तु प्रभु के भजन बिना वह राज्य तथा सभी प्रकार की विद्यायें किस काम की हैं ?
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बुद्धि विद्या रु विभूति१ यहु, हय२ गय३ हेम४ अपार ।
जन रज्जब बे काम के, जे भजै न सिरजन हार ॥१५४॥
बुद्धि, विद्या, ऐश्वर्य१, अश्व२, हाथी३, सुवर्ण४ ये सब अपार हो तो भी व्यर्थ है यदि हरि भजन नहीं करे तो ।
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रज्जब रिधि१ जीव को दई२, राम रहम३ कर राग४ ।
पटा लहै परि पीठ दे , मस्तक बड़े अभाग ॥१५५॥
राम ने दया३ और प्रेम४ करके जीव को संपति दी२ है, यह संपति१ का पटा प्रभु से लेकर प्रभु को पीठ देता है भजन नहीं करता तो समझो इसके मस्तक पर दुर्भाग्य ही आ बैठा है ।
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रज्जब उल्लू आदमी, रारि१ मयी रिधि२ जाण ।
प्रकट प्रभाकर पुण्य दिशि, जे पलक न खोलै प्राण३ ॥१५६॥
मनुष्य उल्लू है, संपत्ति२ उसके नेत्र१ है, ऐसा जानो ! सूर्य के उदय होने पर उल्लू सूर्य की और अपने नैत्र की पलक नहीं खोलता, वैसे ही कृपाण प्राणी३ पुण्य की ओर अपनी संपत्ति को नहीं लगाता ।
(क्रमशः)

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