शुक्रवार, 30 अगस्त 2019

= ३१ =


#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द* 
*राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
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यूट्यूब पर श्रवण हेतु ☛ http://youtu.be/D8mZaqFEcQo
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३१ - मन प्रबोध । पँजाबी त्रिताल
मन रे, राम बिना तन छीजे ।
जब यहु जाय मिले माटी में, 
तब कहु कैसे कीजे॥टेक॥
पारस परस कंचन कर लीजे, 
सहज सुरति सुखदाई ।
माया बेलि विषय फल लागे, 
तापर भूलन भाई॥१॥
जब लग प्राण पिंड है नीका, 
तब लग ताहि जनि१ भूले । 
यहु सँसार सेमल के सुख ज्यों, 
तापर तूँ जनि फूले ॥२॥
अवसर यही जान जगजीवन, 
समझ देख सचु पावे ।
अँग अनेक आन मत भूले, 
दादू जनि१ डहकावे ॥३॥
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*मन को उपदेश कर रहे हैं -* 
हे मन ! राम भजन के बिना शरीर क्षीण हो रहा है, फिर जब यह नर शरीर मिट्टी में मिल जायेगा, तब बता तू अन्य शरीरों में कैसे राम - भजन कर सकेगा ? 
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अत: शीघ्र ही ब्रह्माकार वृत्ति द्वारा सुखप्रद सहज समाधि में ब्रह्मरूप पारस से मिलकर मन - लौह को कंचन - सा निर्मल कर ले । हे भाई ! माया बेलि के तो विषय रूप विष - फल ही लगे हैं, उन पर तू भूलकर भी मत जाना । 
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जब तक स्थूल - सूक्ष्म - शरीर अच्छे हैं तब तक प्रभु का भजन करना मत१ भूल । शरीर रोगी या अति वृद्ध होने पर भजन होना कठिन है । यह सँसार सेमल वृक्ष के समान प्रतीति मात्र ही सुखप्रद है । सेमल के लाल छूलों को देखकर माँस के लोभ से गिद्ध आते हैं और निराश होते हैं । शुक पक्षी उसके फल को खाने के लिए उसके पास जाता है किन्तु उसमें रुई निकलने से वह भी निराश ही होता है । वैसे ही साँसारिक सुख से किसी की भी आशा पूर्ण नहीं होती, उस सुख पर तू मत प्रसन्न हो ।
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यह अच्छा अवसर है, जग - जीवन परमात्मा को ही अपना जान कर विचार द्वारा उनका साक्षात्कार कर, तो तुझे परमानन्द प्राप्त होगा । परमात्मा से अन्य स्त्री - पुत्रादि अनेक शरीरों को देखकर उनकी आसक्ति द्वारा प्रभु को मत भूल व उनमें मोह बहकावे में मत आ ।
(क्रमशः)

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