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*सतगुरु मिलै न संशय जाई, ये बँधन सब देइ छुड़ाई ।*
*तब दादू परम गति पावै, सो निज मूरति मांहि लखावै ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद. ३४६)*
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साभार ~ Dhaval Parmar
यह बात समझ लेनी चाहिए कि पूरब ने जो कथाएँ रची हैं, वे इतिहास की घटनाएँ नहीं हैं; वे अंतरतम की घटनाएँ हैं। राम तुम्हारे भीतर की किसी चीज के प्रतीक हैं और रावण भी तुम्हारे भीतर की किसी चीज के प्रतीक हैं और सीता भी तुम्हारे भीतर है और राम के हाथ से रावण के हाथ में पड़ गयी है। उसे वापस घर लौटाना है।
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तुम्हारे भीतर के राम को तुम्हारे भीतर की सीता की तलाश में निकलना है। तुम्हारी आत्मा ही तुम्हारी सीता है; बाजार में खो गयी है। रावण की लंका सोने की थी--कहीं सोने में खो गयी है; कहीं धन-दौलत में बिक गयी है। तुमने अपनी आत्मा दाँव पर लगा दी है, और कुछ व्यर्थ की चीजें खरीद लाए हो। तुम्हें अपनी सीता को छुड़ाना होगा।
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ऐसे बाहर रावण के पुतले जलाने से कुछ भी न होगा; यह पागलपन बंद करो। भीतर जलाना होगा। यह बाहर की विजय-यात्रा, यह दशहरे का पर्व बहुत मना चुके। इससे कुछ नहीं होता। यह विजय-यात्रा भीतर घटनी चाहिए। यह दशहरा भीतर आना चाहिए। यह विजयदशमी भीतर होनी चाहिए। भीतर का खयाल ही नहीं है। कथा को बाहरी कर दिया है। ऐसे कथा से, कथा के मौलिक अर्थ से बच गए हो।
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इसलिए कथा में इतिहास नहीं होता। राम की कथा में कोई इतिहास नहीं है। कुछ ऐसा नहीं है कि जो राम की कथा में कहा गया है, वैसा-ही-वैसा हुआ है। वैसी भ्रांति में मत पड़ना। नहीं तो वाल्मीकि की कथा एक बात कहती है, तुलसी की कथा दूसरी बात कहती है।
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और भी बहुत लोगों ने रामायणें लिखी हैं, सबकी कथाएँ अलग बात कहती हैं। ऐतिहासिक नहीं है बात। इतिहास से ज्यादा आध्यात्मिक है। इतिहास तो बहाना है। राम और सीता और रावण तो बहाने हैं। उनके पीछे बहानों के पीछे कुछ छिपाया गया है।
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जो श्रवण करेंगे, उन्हें बहानों के पीछे छिपे हुए खजाने मिल जाएँगे। जो केवल सुनेंगे, उनके हाथ में केवल कथा लगेगी; जो कही गयी है, वही बात लगेगी; जो अनकही कहे के साथ जोड़ दी गयी है, वे उससे वंचित रह जाएँगे। वह सूक्ष्म है। वही अर्थ है। श्रवण कथा साँची सुणी, संगति सतगुरु की।
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संतो मगन भया मन मेरा👣ओशो

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