बुधवार, 28 अगस्त 2019

= सुन्दर पदावली(२५.राग ऐराक - ३/१) =

#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
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*प्रीतम रे मेरा एक तूं और न दूजा कोई ।* 
*गुप्त भया किस कारनै काहे न परगट होई ॥(टेक)* 
*हृदै रे मेरै तूं बसै रसना नाम तुम्हारा ।* 
*श्रवनहुं तेरे गुन सुनौं नैंनहु पीव पियारा ॥१॥* 
*नष शिष रे तूंही रमि रह्या रोम रोम घट सारै ।* 
*मन मनसा मैं तूं बसै छिन छिन सुरति संभारै ॥२॥* 
हे मेरे प्रियतम ! मेरे एकमात्र साथी आप हैं, अन्य कोई नहीं । अतः आप कहाँ छिपे हुए हैं । मेरे सन्मुख क्यों नहीं आते ॥टेक॥ 
मेरे हृदय में आपका ही नाम है । जिह्वा भी दिनरात आपका ही नाम रटती रहती है । मेरे कान भी लोगों द्वारा की गयी आपकी प्रशंसा ही सुनते रहते हैं । हे प्रिय ! मेरे नेत्रों के लिये भी एकमात्र आप ही प्रियदर्शन हैं ॥१॥ 
मेरे नख से शिखा तक समस्त शरीर के रोम रोम में आपका ही वास है । अधिक क्या कहूँ मेरा मन एवं उसकी वासना(इच्छा) में भी आप ही रमे हुए हैं; क्योंकि वहाँ भी मैं आपका ही चिन्तन करता रहता हूँ । अर्थात् मेरी सुरति(मानसिक ध्यान) आप में ही लगी रहती है ॥२॥
(क्रमशः)

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