#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*प्रीतम रे मेरा एक तूं और न दूजा कोई ।*
*गुप्त भया किस कारनै काहे न परगट होई ॥(टेक)*
*हृदै रे मेरै तूं बसै रसना नाम तुम्हारा ।*
*श्रवनहुं तेरे गुन सुनौं नैंनहु पीव पियारा ॥१॥*
*नष शिष रे तूंही रमि रह्या रोम रोम घट सारै ।*
*मन मनसा मैं तूं बसै छिन छिन सुरति संभारै ॥२॥*
हे मेरे प्रियतम ! मेरे एकमात्र साथी आप हैं, अन्य कोई नहीं । अतः आप कहाँ छिपे हुए हैं । मेरे सन्मुख क्यों नहीं आते ॥टेक॥
मेरे हृदय में आपका ही नाम है । जिह्वा भी दिनरात आपका ही नाम रटती रहती है । मेरे कान भी लोगों द्वारा की गयी आपकी प्रशंसा ही सुनते रहते हैं । हे प्रिय ! मेरे नेत्रों के लिये भी एकमात्र आप ही प्रियदर्शन हैं ॥१॥
मेरे नख से शिखा तक समस्त शरीर के रोम रोम में आपका ही वास है । अधिक क्या कहूँ मेरा मन एवं उसकी वासना(इच्छा) में भी आप ही रमे हुए हैं; क्योंकि वहाँ भी मैं आपका ही चिन्तन करता रहता हूँ । अर्थात् मेरी सुरति(मानसिक ध्यान) आप में ही लगी रहती है ॥२॥
(क्रमशः)

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