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*देखत अंधे, अंध भी अंधे, जब लग सत्य न सूझै ।*
*देखत देखे, अंध भी देखे, जब राम सनेही बूझै ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद. ३०६)
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साभार ~ @प्रताप चौहान
🙏🏻 *मैं नेत्रहीन भी हूँ, नेत्रवान भी !* 🙏🏻
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आपने उपनिषदों में महामनस्विनी गार्गी का नाम पढा होगा। ऋषि याज्ञवल्क्य की भार्या मैत्रेयी के संदर्भ में भी सुना होगा। ऐसी ही उतमकोटीय विदुषी थी- सुवर्चला। महाभारत ग्रन्थ के शान्तिपर्व में देवी सुवर्चला का वर्णन है। ऋषि देवल की पुत्री सुवर्चला ज्ञानमणि और ओजपूर्ण व्यक्तित्व की धनी थी। दार्शनिक मेधा वाली यह विदूषी सौन्दर्य की भी स्वामिनी थी।
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जब इनकी विवाहोचित आयु हुई, तो पिता देवल चिंतित हुए कि ऐसी अद्वितीय पुत्री के सुयोग्य वर कहाँ से लाएँ। पुत्री सुवर्चला पिता के चिंतन से भिज्ञ थी। इसलिए उसने सुझाव दिया - 'पिताश्री, आप एक स्वंयवर का आयोजन कीजिए। उसमे उच्च कोटि के विद्वत पुरुषो को आमंत्रण भेजिए। मैं उस सभा में एक विशिष्ट प्रश्न पूछूँगी। जो मेरे प्रश्न का यथोचित उतर दे देगा, उसी का मै पति रुप में वरण करुँगी।'
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पिता ने प्रसन्नतापूर्वक पुत्री की अभिलाषा पूर्ण की। निश्चित दिवस स्वंयवर का आयोजन किया गया। सुदूर राज्यों से राजपुरुष व विद्वानजन सभा में भरपूर उत्सुकता से पहुँचे। देवी सुवर्चला ने भरी सभा में प्रश्न उछाला -
*'यद्-यास्ति समितौ वित्रो अंधनंधः समे पतिः।'*
*आप में से वह पुरुष आगे आए, जो अंधा भी है और आँखवाला भी है : जो नेत्रहीन होने के साथ-साथ नेत्रवान भी है। वही मेरा पति होने के लिए उपयुक्त है।*
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शर्त सुनते ही सभा उद्वेलित हो गई। भला यह कैसी विचित्र प्रहेलिका है ! दोनों स्थितियाँ तो विरोधाभासी है। एक ही पुरुष में दोनों की विद्यमानता कैसे हो सकती है? विद्वत समाज अनुतरित रह गया।
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फिर एक दिन ऋषि देवल के आश्रम में उपनिषदों के विचारवान श्वेतकेतु का पदार्पण हुआ। श्वेतकेतु ने सुवर्चला की शर्त सुनी, तो तुरन्त उसमे निहित विचार और मर्म को जान गए। उन्होने ऋषि देवल से कहा 'आप अपनी पुत्री को यहाँ बुला लें। मैं उतर देने हेतु प्रस्तुत हूँ।' सुवर्चला आई, तो ऋषिकुमार ने उन्हें सम्बोधित करते हुए कहा -
श्वेतकेतु - *देवी ! तुम्हारी कथनी के अनुसार मैं वह पुरुष हूँ, जो अंधा भी हूँ, आँखवाला भी हूँ।*
सुवर्चला - *कृपया विवेचना कीजिए, कैसे?*
श्वेतकेतु - *अंधोहमत्र तत्वं हिं - मैं नेत्रहीन हूँ। यह सत्य है। जिस प्रकार संसार लौकिक नेत्रों के द्वारा बाहरी दृश्यों का दर्शन करता है, मैं उस लौकिक दृष्टि से देखता ही नहीं। अतः मैं सांसारिक दृष्टिकोण से, स्थूल नजरिए से अंधा ही हूँ। परन्तु इसी के साथ मैं नेत्रवान भी हूँ। जिस ब्रह्म की शक्ति से मनुष्य देखता है, सुनता है, सूंघता है, बोलता है, स्वाद लेता है, ग्रहण करता है, अपना जीवन यापन करता है - वास्तव में वही परम इन्द्रिय है, समस्त ऐन्द्रिक अनुभवों का कारण है। वही वास्तविक नेत्र भी है। मैंने तत्वज्ञान द्वारा उसी नेत्र को उपलब्ध किया है। ब्रह्म का साक्षात्कार कर, उसकी चैतन्यता से चेतन होकर ही दृश्यों को देखता अथवा जानता हूँ अथवा उनका अनुभव करता हूँ। अतः मैं आध्यात्मिक दृष्टिकोण या सूक्ष्म नजरिए से नेत्रवान हूँ।*
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यह महाभारत कालीन दृष्टांत अत्यंत सूक्ष्म हैं। यह लौकिक अथवा अलौकिक, दोनो प्रकार के ज्ञान और अनुभूतियों के विज्ञान को उजागर करता है। विज्ञान की शैली में कहे, तो यह *'Science of Cognition'* की और संकेत करता है, जो वर्तमान समय में मनोविज्ञान, दर्शनशास्त्र, भौतिकी, जीव-विज्ञान आदि क्षेत्रो की जिज्ञासाओं का केन्द्र बना हुआ है।
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रुद्र प्रताप सिंह,
इस्कॉन - लखनऊ

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