#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
.
*= २७. राग धनाश्री - ८/१ =*
.
*हरि हम जांणियां, है हरि हम हीं मांहिं ।*
*जौ बाहर कौं देषिये, तौ कछु दूजा नाँहिं ॥(टेक)॥*
*जौ हम इहां बैठे रहैं तौ वह नाहीं दूरि ।*
*जौ शत जोजन जाइये तौ उंहऊं भरपूरि ॥१॥*
हे हरि ! अब हमने जान लिया कि आप हमारे हृदय में ही विराजमान हैं । यदि हम आपको बाहर खोजेंगे तो वहाँ कौन दूसरा बैठा है ॥टेक॥
सचाई तो यह है कि यदि हम यहाँ बैठ रहन तो वह प्रभु हम से दूर नहीं हैं और यदि हम यहाँ से सौ योजन दूर जा कर उसको खोजें तो वहाँ भी वह पूर्णतः विद्यमान है ॥१॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें