#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= २७. राग धनाश्री - ७/१ =*
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*हरि निरमोहिया कहां रहे करि बास ।*
*पहलैं प्रीति लगाइकैं अब क्यौं भये उदास ॥(टेक)*
*लाड लडाये बहुत ही हौंस पुजाई कोडि ।*
*बनिजारा की आगि ज्यौं गये बलंती छोडि ॥१॥*
*पलक घरी जुग जात है क्यूं करि राषौं प्रांन ।*
*मैं जानौं संगही रहौं तुम यह तौरी तांन ॥२॥*
ओ निर्मोही प्रभु ! आप कहां जाकर वस गये । आपने ही मुझसे पहले प्रीति लगायी था, अब आप कहाँ जा कर छिप गये ! ॥टेक॥
आपने ही आरम्भ में प्यार जताया था तथा उससे अनेक प्रकार की भावी आशाएँ जगायी थीं । परन्तु जैसे वणजारे, आगे प्रयाण करते समय, पूर्व स्थान और अग्नि जलती हुई छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं; आप भी हमारी वैसी ही स्थिति बना कर हमें छोड़ गये ॥१॥
एक एक पल, एक एक घड़ी समय बीत रहा है, मैं कैसे अपने प्राण धारण किये रहूँ । मेरे मन में तो यही निश्चय था कि मैं जीवन पर्यन्त आपका साथ निभाऊँगी, परन्तु आपने ही यह क्रम तोड़ दिया ॥२॥
(क्रमशः)

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