🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*ज्यों आपै देखै आपको, यों जे दूसर होइ ।*
*तो दादू दूसर नहीं, दुःख न पावै कोइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ दया निर्वैरता का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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अपने दुख सम सभी का, लखते भक्त सुजान ।
माता हरजीराम की, धन लख भई मलान ॥३९५॥
हरजीरामजी पूर्व आश्रम(पूरा जन्म) में क्षत्रिय थे । एक समय उन्होंने किसी धनाढ्य को लूटा ओर धन लाकर अपनी माता के आगे रखा । माता ने पूछा - "यह कहां से लाया ?"
हरजीराम - 'धाड़(लूटकर) देकर लाया हूं'
यह सुनते ही माता परम दुखी होकर बोली - 'बेटा ! यह काम तुमने अच्छा नहीं किया । यदि कोई मुझे लूटे तो मुझे और तुझे कितना दु:ख होगा । किसी को दुखी करके सुख भोगना पाप है । यह धन जिसका है उसे लौटा दो ।'
माता की बात सुनकर हरजीराम को वैराग्य हो गया और धन पीछा लौटाकर फिर नरेना दादूपंथ के आचार्य श्री कृष्णदेवजी महाराज की शिष्य परम्परा में शिष्य होकर जयपुर राज्य के गुढा गांव की पहाड़ी पर बैठ कर भजन में लग गये और आगे चल कर एक महान संत हुये ।
इससे सूचित होता है कि भक्त अपने दु:ख के समान ही दूसरे का दु:ख भी जानते हैं ।
### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ###
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्य राम सा ###

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