सोमवार, 23 सितंबर 2019

= *काल का अंग ८४(२५/२८)* =

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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*काल गिरासे जीव को, पल पल श्वासैं श्वास ।*
*पग पग मांहि दिन घड़ी, दादू लखै न तास ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*काल का अंग ८४*
रज्जब काया कूप में, आयु१ आखिरै नीर । 
रहट२ रैणी दिन घड़ि३ घड़ी४, भरिये सलिल५ समीर६ ॥२५॥
जैसे कूप में से अरहट२ जल की घड़ियाँ३ भर भर निकलने से जल५ का अंत१ आ जाता है, वैसे ही रात्रि-दिन और घटिकाओं४ के द्वारा श्वास६ कम होते होते आयु का अन्त१ आ गया है । 
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रज्जब तन तरकस१ तें जात है, श्वास स्वरूपी तीर । 
माँग मिलै न मोल सो, अरु ये निघटे२ वीर३ ॥२६॥
हे भाई३ ! शरीर रूप तुणीर१ से श्वास रूप बाण निकल निकल कर जा रहे हैं, ये श्वास न माँगे हुये मिलते हैं, न मोल मिलते हैं हैं और समाप्त२ होते जा रहे हैं । 
घड़ी१ घड़ी करती रहै, पट२ प्राणी की आव३ । 
रज्जब रेजा४ कछु रह्या, सो तू ध्वजा चढाव५ ॥२७॥
दिन-रात्रि की घड़ियाँ१ प्राणी की आयु३ रूप वस्त्र२ की घड़ी करती रहती हैं, हे प्राणी ! अब तो आयु वस्त्र का थान४ घड़ी करने से कुछ ही बच रहा है अर्थात बुढापा आ गया है, इस बचे हुये की तू भगवान् के ध्वज चढादे५, अर्थात बची आयु को तो प्रभु के भजन में लगा दे । 
रज्जब धवणि१ लुहार की, त्यों स्वर नासिक दोय । 
भजन विमुख पावक पवन, देखो दहम२ सु होय ॥२८॥
जैसे लुहार की धौंकनी१ होती है, वैसे ही नासिक के दोनों स्वर हैं, जैसे लुहार की धौंकनी अग्नि जलाकर२ कोयला आदि को भस्म कर देती है, वैसे ही देखो, नासिका की आयु भी भगवद् भजन से विमुख प्राणियों की आयु समाप्त करके उन्हें नष्ट करती है । 
(क्रमशः)

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