रविवार, 22 सितंबर 2019

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🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू चौरासी लख जीव की, प्रकृति घट मांहि ।*
*अनेक जन्म दिन के करै, कोई जाणै नांहि ॥*
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साभार ~ Atul Verma

रोज एक मृत्यु घटती है। अगर हम इसे और करीब लाएं, तो और समझ में आ सकेगा। जब आप श्वास भीतर लेते हैं, तब वह जीवन की होती है, और जब आप श्वास बाहर फेंकते हैं, तब वह मृत्यु की होती है। एक—एक श्वास के साथ भी मृत्यु का संबंध जुड़ा हुआ है। जब श्वास बाहर जाती है, तब आप मृत्यु के क्षण में होते हैं; और जब श्वास भीतर आती है, तब आप जीवन के क्षण में होते हैं। एक— एक श्वास में भी जन्म और मृत्यु का पैर जुड़ा हुआ है। इसलिए बाहर श्वास जाती है, उस वक्त आपकी जीवन—ऊर्जा क्षीण होती है ! जब भीतर श्वास आती है, तब आप जीवंत होते हैं।
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एक—एक श्वास में जन्म और मृत्यु। दिन में जन्म और रात में मृत्यु। अगर हम इस पूरे जीवन को जन्म समझें, तो फिर एक मृत्यु। अगर हम इस पूरे जगत को जीवन समझें, तो फिर एक प्रलय। मृत्यु अनिवार्य है जीवन के साथ। मृत्यु विश्राम है, जीवन थकान है। जीवन तनाव है, जीवन श्रम है। मृत्यु विश्राम है, विराम है, पुन: जीवन—शक्तियों को पा लेना है।
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यह सारा विराट विश्व भी थक जाता है ! आप ही नहीं थक जाते । पहाड़ भी बूढ़े हो जाते हैं, पृथ्वियां भी की हो जाती हैं, सूरज भी के हो जाते हैं। आप ही नहीं मरते, पृथ्वियां भी मरती हैं, सूरज भी मरते हैं, पहाड़ भी मरते हैं। इस जगत में जो भी है, वह मृत्यु और जीवन दोनों में डोलता रहता है।
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तो कृष्ण ने कहा कि रुद्रों में मैं शंकर हूं— मृत्यु का, प्रलय का। लेकिन जीवन के विपरीत नहीं है मृत्यु। यही कृष्ण समझाना चाहते हैं अर्जुन को कि तू जीवन और मृत्यु को अलग—अलग करके देखता है। तू सोचता है, जीवन सदा ही हितकारी है और मृत्यु सदा ही। अहितकारी है। ऐसा विभाजन भ्रांत है। ऐसा विभाजन भ्रांत है। मृत्यु विश्राम है।
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जीवन तरंग का उठना है आकाश की तरफ, मृत्यु तरंग का वापस सागर में खो जाना है। तू मृत्यु से इतना भयभीत न हो और तू मृत्यु के संबंध में इतनी चिंता मत कर। वह भी मैं ही हूं। और तू यह भी मत सोच कि तेरे द्वारा यह मृत्यु हो रही है। न तेरे द्वारा यह जीवन हुआ है, न तेरे द्वारा यह मृत्यु हो सकती है।
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ध्यान रखें, न तो हमारे द्वारा जीवन हुआ है, न हमारे द्वारा मृत्यु हो सकती है। लेकिन हम मान लेते हैं। अगर आप एक बच्चे को जन्म देते हैं, तो आप सोचते हैं, आपने जन्म दिया है।
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आप केवल एक पैसेज थे, एक मार्ग थे, जिससे बच्चा जन्मा है। आप सिर्फ एक द्वार थे, एक राह थे, जिससे बच्चा आया है। आपने क्या जन्म दिया है? जो आदमी पिता बन जाता है, उसने कभी सोचा है कि उसने किया क्या है पिता होने के लिए?
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अगर हम तथ्य पर उतरें, तो पता चलेगा कि वह आदमी सिर्फ एक मार्ग था। प्रकृति ने उसका मार्ग की तरह उपयोग किया है। जीवन उसके द्वारा आया है, वह लाया नहीं है जीवन को। और सच तो यह है कि जीवन जब उसके द्वारा आता है, तो वह इतना परवश होता है ! इसीलिए कामवासना इतनी प्रगाढ़ है कि आप उस पर काबू नहीं पा सकते। क्योंकि जब जीवन धक्के देता है भीतर से, तो आप बिलकुल विवश हो जाते हैं। कामवासना में आप होते कहां हैं ! प्रकृति होती है; आप नहीं होते।

गीता दर्शन, भाग–5, अध्याय—10
OSHO

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