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*काल कीट तन काठ को, जरा जन्म को खाइ ।*
*दादू दिन दिन जीव की, आयु घटंती जाइ ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*काल का अंग ८४*
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चंद सूर पाणी पवन, धरती अरु आकाश ।
ये रज्जब जोख्यों१ भरे, खलक२ सहित षट नाश ॥२१॥
चन्द्रमा, सूर्य, जल, वायु, पृथ्वी, और आकाश ये भी काल के भय रूप दु:ख से पूर्ण१ है और संसार२ के सहित छओं ही नाश होंगे ।
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आवख्या१ तरुवर कटै, अह निशि बहै कुहाड़ ।
जन रज्जब सो क्यों रहै, जो आया बिच दाड़ ॥२२॥
आयु१ रूप वृक्ष कट रहा है, उस पर रात्रि-दिन रूप कुल्हाड़े पड़ रहे हैं, वह कैसे बचेगा जो काल की दाढों के बीच में आ गया है ।
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आवख्या१ सरवर घटै, मानै मिनख न मीन ।
जो रज्जब माता जगत, माया मोह मद पीन ॥२३॥
तलाब का जल प्रति दिन कम हो रहा है, किन्तु मच्छी उसमें मगन है, वह इस बात को नहीं मानती, वैसे ही आयु१ प्रति दिन घट रही है किन्तु जो नर जगत् में माया - मोह रूप मद्य पीकर मतवाला हो रहा है, वह इस बात को नहीं मानता ।
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कड़ी जड़ी तल१ जाल की, मीन मुदित२ जल माँहिं ।
त्यों रज्जब जीत्या जरा, जीवहिं सूझे नाँहिं ॥२४॥
नीचे१ जाल की कड़ी लगी हुई है और मच्छी जल में प्रसन्न२ हो रही है, वैसे ही बुढापे ने जीव को जीत लिया है किन्तु जीव को वह दीखता ही नहीं है ।
(क्रमशः)

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