#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= २७. राग धनाश्री - ९/१=*
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*ब्रह्म बिचार तैं ब्रह्म रह्यौ ठहराइ ।*
*और कछू न भयौ हुतौ भ्रम उपज्यौ थौ आइ ॥(टेक)*
*ज्यौं अन्धियारो रैनि मैं कल्पि लियौ रजु ब्याल ।*
*जब नीकैं करि देषियौ भ्रम भाग्यौ ततकाल ॥१॥*
ब्रह्मचिन्तन करने पर यह स्पष्ट ज्ञात हो जाता है कि यहाँ ब्रह्म की ही स्थायी सात्ता है । इसके अतिरिक्त न कुछ हुआ न है । प्रतीत होने वाला यह सब कुछ भ्रममात्र है ॥टेक॥
जैसे हम कभी अन्धेरी रात्रि में किसी रज्जु को देखकर उसमें सर्प की कल्पना कर लेते हैं । परन्तु जब हम यथार्थ पर पहुँचते हैं तो हमारा वह भ्रम तत्काल नष्ट हो जाता है ॥१॥
(क्रमशः)

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