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*यहु व्रत सुन्दरी ले रहै, तो सदा सुहागिनी होइ ।*
*दादू भावै पीव कौं, ता सम और न कोइ ॥*
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साभार ~ Priyanka Rai
👏🏼भगवान की अनन्त कृपा है कि मुझसे संपर्क करने वाले ज्यादातर मित्र आध्यात्मिक चर्चा ही करते हैं। पर कईं मित्रों को ऐसी सांसारिक समस्या होती है, जिनका यदि निदान हो जाए तो भगवद् यात्रा में सरलता हो जाए।
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यह तो सभी जानते हैं कि ग्रहों की संख्या नौ है, माना जाता है कि यदि ये नौ ग्रह अनुकूल हो जाएँ तो जातक कष्ट नहीं पाता। हालांकि ऐसा है नहीं, दुख तो कामना का पुत्र है, ग्रहों की अनुकूलता से अन्त:करण कामना रहित तो होता नहीं, तो दुख कैसे न हो। जिसके जीवन में कोई समस्या नहीं, उन्हें भी दुखी देखा ही जाता है।
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लोग दुनिया भर के उपाय करते हैं, पर आज शनि ठीक हुआ तो कल मंगल बिगड़ गया, उसका उपाय किया तो राहु केतु ने अड़ंगा डाल दिया। माने कुछ ना कुछ उठापटक चली ही रहती है। तब क्या करें? आज आपको रामबाण उपाय बता रहा हूँ।
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आप भी उसे जानते होंगे पर मौके पर ध्यान नहीं रहता। तो असली बात यह है कि उन नौ ग्रहों के अलावा भी एक दसवाँ ग्रह है। और मजेदार बात यह है कि एक तो वह कभी प्रतिकूल नहीं होता, वह तो सदा अनुकूल ही रहता है, हम ही उसके प्रतिकूल पड़ जाते हैं। दूसरे यदि हम ही उसके अनुकूल पड़ जाएँ, तो वे नौ के नौ भी क्यों न हमारे पीछे हाथ धोकर पड़ जाएँ, बाल तक भी हिला नहीं सकते, बाँका करने कि तो बात दूर रही। उनकी औकात ही नहीं है। यहाँ तक की कितना ही दुर्भाग्य माथे पर लिखा हो, आँख में आँसू नहीं आता, दुख पास फटके तब तो आँसू आएँ।
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वह दसवाँ ग्रह है "अनु-ग्रह", भगवान का अनुग्रह। किसी को उसे अनुकूल करना नहीं पड़ता, वह तो अनुकूल सब पर है, एक समान अनुकूल है, सतत अनुकूल है। उसका लाभ लेने के लिए किसी बाह्य उपाय की भी आवश्यकता नहीं, केवल उस अनुकूलता की अनुभूति ही करनी है।
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भक्तों को देखो, आग में जलाए जा रहे हैं, हाथी से कुचलवाए जा रहे हैं, जहर पिलाया जा रहा है, पर आँख में आँसू है क्या? उन्हें कोई उपाय करना तो दूर, करने का विचार तक नहीं आया। कोई सहायता करने आया तो भी दरवाजे से लौटा दिया गया।
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फल क्या मिला? भगवान को ही आना पड़ा, स्वयं आना पड़ा, भोजन की थाली छोड़कर आना पड़ा, कष्ट उठाकर आना पड़ा। यदि आप उस ग्रह के अनुकूल हो जाएँ तो आज भगवान का स्वभाव बदल नहीं गया है। क्या वे आपके लिए नहीं आएँगे? आएँगे, जरूर आएँगे॥

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