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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*ये दिन बीते चल गये, वे दिन आये धाइ ।*
*राम नाम बिन जीव को, काल गरासै जाइ ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*काल का अंग ८४*
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शक्ति१ शक्ति सौं नीकसी, कहैं और की और ।
रज्जब काढ्या धन धण्योंहु, उठी२ आत्मा ठौर ॥३४॥
स्थूल शरीर रूप माया१ से सूक्ष्म शरीर रूप माया निकली है किंतु लोग और की और ही कहते हैं अर्थात आत्मा चला गया ऐसा कहते हैं । आकाशादि पंच तत्त्व रूप स्वामी अपना कार्य रूप धन नकाल देते हैं तब आत्मा की अभिव्यक्ति का स्थान स्थूल शरीर नष्ट२ हो जाता है, इसी का नाम काल आना है ।
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छसै सहस इक बीस बरियाँ१, मारुत माग महंत ।
रज्जब अहनिशि उठि चलै, कहु कैस सु रहंत ॥३५॥
रात्रि-दिन में इक्कीस हजार छ सौ बार१ श्वास रूप वायु जाने के मार्ग को पकड़ता है अर्थात ऊपर जाता है । इस प्रकार जो रित्रि-दिन उठ २ कर चलता ही रहे वह कहो कैसे रहेगा ।
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अहुंठ१ कोड़२ इकई३ उभय४, इते माग५ मधि६ एक ।
रज्जब जीव जल क्यों रहै, काया कुंभ ये छेक ॥३६॥
साढे तीन१ कोटि२ रोम कूप और साढे तीन का दो४ गुना सात, एक३ का दो गुना दो, सात और दो नौ, इस प्रकार साढे तीन कोटि और नौ ये छिद्र जिस घड़े में हो उसमें जल कैसे रह सकता है ? वैसे ही शरीर के साढे तीन कोटि रोम कूप और नौ द्वार हैं इतने५ मार्गो वाले शरीर में६ एक जीव कैसे रह सकेगा ?
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रज्जब रज मारुत लगी, वपु सु बधूला हेर१ ।
गात बात२ गत३ गाँठ को, कहु छूटत४ क्या बेर ॥३७॥
देखो१ वायु से रज लगने से बधूला बन जाता है, वैसे ही कर्म से शरीर बन जाता है किन्तु कहो, उस बधूले रूप वायु२ की गाँठ को खुलते४ क्या देर लगेगी ? वैसे ही शरीर को नष्ट३ होते क्या देर लगेगी ।
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रज्जब रुकसी१ घाट२ सब, काल कष्ट तन भौन३ ।
श्वास शब्द संकट परै४, तब सुमिरेगा कौन ॥३८॥
जब काल का कष्ट आयेगा तब शरीर रूप भवन३ के सभी मार्ग२ रुक जायेंगे१, अर्थात इन्द्रयादि काम न देंगे, श्वास लेने में तथा शब्द बोलने में भी कष्ट पड़ता४ ज्ञात होगा, तब भगवान का स्मरण कौन कर सकेगा ?
(क्रमशः)

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