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*बाहर गढ निर्भय करै, जीबे के तांहीं ।*
*दादू मांहीं काल है, सो जाणै नांहीं ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*काल का अंग ८४*
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जीवी१ ऊपर जतन बहु, टूटी२ टूटे३ सब्ब ।
कहना था सो यह कहा, मन वच कर्म रज्जब ॥२९॥
आयु१ शेष रहने पर तो यत्न भी बहुत हैं, आयु समाप्त२ होने पर वे यत्न भी बस समाप्त३ हो जाता है । हमको जो कहना था सो मन, वचन, कर्म से यह कह दिया है ।
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जीवी१ ऊपर यत्न बहु, आवहि अनन्त उपाव ।
रज्जब राम सु काढिले, तब थाके सब डाव२ ॥३०॥
आयु१ शेष रहने पर तो बहुत - से धन हैं, अनन्त उपाय याद आते है और जब रामजी श्वास शरीर से निकाल लेते हैं तब सब दाँव२ थक जाते हैं, कुछ भी काम नहीं देते ।
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होती आयु उपाव बहु, औषधि यत्न अनेक ।
सो सरकावै१ साँईया, तब तिहिं कामन एक ॥३१॥
आयु शेष होती है तब तो उपाय भी बहुत याद आते हैं, औषधि आदि अनेक यत्न किये जाते हैं, और उस आयु रूप श्वास को प्रभु शरीर से हटादे१, तब उसकी जीवन तब उसकी जीवन रक्षा के लिये एक भी उपाय काम नहीं देता ।
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जीव जतन बहुतैं करैं, क्यों ही मरिये नाँहिं ।
रज्जब रोकै बाहली१, मारणहारा माँहिं ॥३२॥
किसी प्रकार हम न मरैं, इसके लिये जीव बहुत से साधन करते हैं और बाहर के आधात को रोक भी देते हैं किन्तु मरने वाला तो भीतर ही है उसे कैसे रोकें ।
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जुगति जतन सारे रहे, जब जम पकड्या शीश ।
रज्जब धन धणियों१ लिया, कहा करैं तेतीस ॥३३॥
जब यम आकर शिर पकड़ता है तब युक्ति और साधन सब धरे ही रह जाते हैं कोई भी कोई भी काम नहीं देते कार्य रूप धन को कारण रूप स्वामी१ ले जाते हैं अर्थात व्यष्टि स्थूल आकाशादि समष्टि स्थूल आकाशादि में मिल जाते हैं और जीव कर्म के अनुसार चला जाता है । अब यहाँ मनाने पर भी तेतीस देवता क्या करेंगे ।
(क्रमशः)

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