मंगलवार, 24 सितंबर 2019

= ५६ =


🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🙏 *#श्रीदादूअनुभववाणी* 🙏
*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥
.
५६ - प्रश्न । पँचम ताल
मैं नहिं जानूँ सिरजनहार, 
ज्यों है त्योंहि कहो करतार ॥टेक॥
मस्तक कहां कहां कर पाइ, 
अविगत नाथ कहो समझाइ ॥१॥
कहं मुख नैनाँ श्रवणाँ साँई, 
जानराइ सब कहो गुसाँई ॥२॥
पेट पीठ कहां है काया, 
पड़दा खोल कहो गुरुराया ॥३॥
ज्यों है त्यों कह अंतरजामी, 
दादू पूछै सतगुरु स्वामी ॥४॥
.
स्वरूप विषयक प्रश्न कर रहे हैं - हे सृष्टिकर्ता प्रभो ! मैं नहीं जानता, आपका स्वरूप कैसा है ? इसलिए आप जैसे हो, वैसे ही कृपा करके अपना स्वरूप हमें कहो । 
.
आपका मस्तक कहां है ? कहां हाथ पैर हैं ? मन इन्द्रियों से अज्ञात स्वामिन् ! समझाकर कहो, 
.
आपके मुख, नेत्र और श्रवण कहां हैं ? हे ज्ञानियों में अति श्रेष्ठ स्वामिन् ! 
.
आपका पेट, पीठ आदि अँगों से युक्त शरीर कहां है ? हे गुरुजनों के शिरोमणि, अन्तर्यामी सद्गुरु स्वामिन् ! पड़दा हटा कर, 
.
जैसे आप हैं, वैसे ही स्पष्ट रूप से कहो । इन सब प्रश्नों का उत्तर आगे की दो साखियों द्वारा दे रहे हैं -
उत्तर की साखी
दादू सबै दिशा सो सारिखा, सबै दिशा मुख बैन ।
सबै दिशा श्रवणहुं सुने, सबै दिशा कर नैन ॥ (४-२१२)
सबै दिशा पग शीश है, सबै दिशा मन चैन ।
सबै दिशा सन्मुख रहे, सबै दिशा अँग ऐन ॥ (४-२१३)
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें