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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= २७. राग धनाश्री - ८/२=*
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*शेष नाग बैकुंठ लैं जहां लगै ब्रह्मंड ।*
*वह हरि उहंऊंते परै इहां परै नहिं षंड ॥२॥*
*यौंही वेदन मैं कह्यौ यौंही भाषहिं संत ।*
*यौं जाणैं बिन ह्वै नहीं जनम मरन कौ अंत ॥३॥*
*जाकौं अनुभौ होइ है सोई जानै जांन ।*
*सुन्दर याही संमुझि है याही आतम ग्यांन ॥४॥*
शेषनाग(पाताल) के स्थान से वैकुण्ठ(विष्णु के आवास) तक जितना भी ब्रह्माण्ड का विस्तार है, वे भगवान् वहाँ भी वही हैं, जब कि उनका कोई खण्ड नहीं है । वे अखंड हैं और व्यापक हैं ॥२॥
“भगवान् सर्वव्यापक हैं” यही बात वेदों में कही गयी है, सन्त जन भी ऐसा ही कहते हैं । इस यथार्थ को जाने बिना किसी भी साधक की साधना पूर्ण नहीं हो सकती और न उसके जन्म मरण का ही अन्त हो सकता है ॥३॥
जिनको साधना करते करते अनुभव हो चुका है – ऐसे सिद्ध पुरुष ही उस निराकार पुरुष को जान सकते हैं । महात्मा सुन्दरदासजी कहते हैं – यही सन्तों की ज्ञानमयी बुद्धि का निष्कर्ष है और यही उनका आत्मज्ञान है ॥४॥
(क्रमशः)

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