बुधवार, 25 सितंबर 2019

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*दादू निर्मल शुद्ध मन, हरि रंग राता होइ ।*
*दादू कंचन कर लिया, काच कहै नहीं कोइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ मन का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ##भाग १ ##मन*
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फतहपुर नवाब ने सन्त दादूजी के शिष्य छोटे सुन्दरदासजी से प्रार्थना की -
"भगवन ! आपने भगवत् साक्षात्कार किया हे, इसलिये कृपा करके हमें भी उसका साधन बतावे ?"
"सुन्दरदासजी - "एक शुद्ध जल का भरा कांसे का कटोरा मंगवें तथा कुछ भस्म भी ।" नवाब ने तुरंत दोनों मंगवा लिये ।
पात्र के जल मे भस्म मिलाकर सुन्दरदासजी ने कहा - "इसमें देखो क्या क्या दिखता है ?" नवाब - "कुछ भी नहीं।"
सुन्दरदासजी - "इस जल को पृथ्वी पर डाल दो और शुद्ध जल भर कर मंगा लो ।" नवाब ने तुरंत मंगा लिया ।
सुन्दरदासजी ने जल के कटोरे पर अपने हाथ की हलकी सी चोट मारकर कहा - "अब देखो तो क्या दीखता है ।"
नवाब - "छिन-भिन्न मुख ।"
फिर जब जल स्थिर हो गया तब सुन्दरदासजी ने कहा - अब फिर देखो क्या दिखता है ?" नवाब - "साफ साफ मेरा मुख ।"
यह सुन के कटोरे का जल गिरा कर चुपचाप बैठ गये । थोड़ी देर बाद नवाब ने फिर उपयुक्त प्रश्न किया ।
सुन्दरदासजी बोले - "इसका उत्तर तो हमने दे दिया ।"
नवाब - "मैं नही समझा ।"
सुन्दरदासजी - "जब जल मलीन था तब कुछ न दिखा, ऐसे ही मलीन मन को ईश्वर नहीं भासता, निष्काम कर्म से शुद्ध करो । फिर चंचल जल मे छिन्न-भिन्न मुख भासा । वैसे ही शुद्ध होने पर भी जब तक मन चंचल रहेगा तब तक ईश्वर साफ-साफ नही भासेगा । उपासना से एकाग्र करो । फिर जैसे शुद्ध और स्थिर जल में मुख साफ-साफ भासा था वैसे ही शुद्ध और एकाग्र मन मे ज्ञान द्वारा ईश्वर का यथार्थ साक्षात्कार होगा । इसमे संशय नहीं।"
### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ###
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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