शनिवार, 21 सितंबर 2019

= *काल का अंग ८४(१७/२०)* =

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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*दादू काया कारवीं, मोहि भरोसा नांहि ।*
*आसन कुंजर शिर छत्र, विनश जाहिं क्षण मांहि ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*काल का अंग ८४*
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आदित्य अंतक१ देखतों, ओले२ ज्यों अभिलाख । 
अठारह भार आगि३ हिं मिलत, पान फूल फल राख ॥१७॥ 
सूर्य को देखते ही बर्फ के कंकर२ नष्ट हो जाते हैं, अग्नि३ लगने पर अठारह भार वनस्पति के पत्र, फूल, फलों की भस्म हो जाती है, वैसे ही काल१ के आते ही संपूर्ण अभिलाषाओं के सहित शरीर नष्ट हो जाता है । 
कहा१ इन्द्रासन इन्द्र को, कहा पहुमि२ पुनि राज । 
जे रज्जब जीजे नहीं, तो जग त्रय किहिं काज ॥१८॥ 
यदि जीवित नहीं रहें तो इन्द्र के इन्द्रासन से तथा पृथ्वी१ के राज्य से क्या२ लाभ है ? और तीनों लोक रूप जगत भी किस काम का है ? 
रजधानी सब लोक की, पावै बिसवा बीस । 
सो रज्जब झूठी सभी, जे जम आमिर१ शीश ॥१९॥ 
यदि शिर पर काल बस१ रहा है, तो बीसों बिसवा सम्पूर्ण लोकों की राजधानी प्राप्त करने पर भी वह मिथ्या ही है । 
लघु दीरध आयु सु अल्प, जे शिर ऊपर मीच । 
रज्जब राम संभालिये, ढील न कीजे नीच ॥२०॥ 
यदि शिर पर मृत्यु खड़ी है तो लघु व दीर्घ आयु भी अति अल्प है, अत: हे नीच ! राम का स्मरण कर ढील मत कर । 
(क्रमशः)

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