शनिवार, 21 सितंबर 2019

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🙏 *#श्रीदादूअनुभववाणी* 🙏
*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६* 
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥
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५३ - हैरान प्रश्न । वर्ण भिन्न ताल
कादिर१ कुदरत२ लखी न जाइ, 
कहां तैं उपजै कहां समाइ ॥टेक॥
कहां तैं कीन्ह पवन अरु पानी, 
धरणि गगन गति जाइ न जानी ॥१॥
कहां तैं काया प्राण प्रकासा, 
कहां पँच मिल एक निवासा ॥२॥
कहां तैं एक अनेक दिखावा, 
कहां तैं सकल एक ह्वै आवा ॥३॥
दादू कुदरत बहु हैराना, 
कहां तैँ राख रहे रहमाना३ ॥४॥
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आश्चर्ययुक्त प्रश्न कर रहे हैं - समर्थ१ परमात्मा की माया२ जानी नहीं जाती, बड़ी आश्चर्य रूप है ।
१ - यह सँसार कहां से उत्पन्न होता है और कहां समा जाता है ?
२ - आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी कहां से प्रकट किये हैं ? उनकी चेष्टा जानी नहीं जाती ।
३ - कहां से शरीर को रचा ?
४ - कैसे उसमें प्राण प्रकट कर दिये ?
५ - कैसे पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ मिलकर एक शरीर में निवास करती हैं ?
६ - कैसे अपने एक स्वरूप से अनेक जीव दिखा देते हैं ?
७ - कैसे प्रलय काल में सब एक हो जाते हैं ?
८ - वे दयालु३ ईश्वर सबकी रक्षा करते हुये भी कैसे निर्विकार रहते हैं ? उनकी माया अति आश्चर्य रूप है ।
क्रमश: प्रश्नों के उत्तर हैं - 
१ - ईश्वर से उत्पन्न होकर उसी में समाता है । 
२ - अहँकार से । ३ - वीर्य से । 
४ - ७ - अपनी सत्ता से । ८ - निर्द्वन्द्व होने से ।
साखी उत्तर की -
रहे नियारा सब करै, काहू लिप्त न होइ ।
आदि अन्त भानै घड़े, ऐसा समर्थ सोइ ॥ (२१ - ३०)
श्रम नाहीं सब कुछ करै, यों कल धरी बनाइ ।
कौतिकहारा ह्वै रह्या, सब कुछ होता जाइ ॥ (२१ - ३१)
दादू शब्दैं बँध्या सब रहे, शब्दैं ही सब जाइ ।
शब्दैं ही सब ऊपजै, शब्दैं सबै समाइ ॥ (२२ - २)
(क्रमशः)

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