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*दादू पानी के बहु नाम धर, नाना विधि की जात ।*
*बोलणहारा कौन है, कहो धौं कहाँ समात ॥*
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साभार ~ Archana Maheshwari
*नमन ~ ओशो पर मोरारी बापू*
*ओशो पर बोलने में बड़ा आनंद आता है साहब !!*
सूरत यूनिवर्सिटी गुजरात में ओशो चेयर...
ओशो पीठ की स्थापना के अवसर पर, ओशो पर एक प्रवचन करते हुए मुरारी बापू ने कहा कि मैंने ओशो के दो बार दर्शन किए, दो बार उन्हें सुनने का मौका मिला .. एक बार मुंबई में व दूसरी बार पुणे में !!
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मैं गया, लेकिन मेरा दुर्भाग्य तो नहीं कहूँगा लेकिन वह सीरीज, वह प्रवचनमाला अंग्रेजी में थी .. लेकिन शब्द समझ में नहीं आए तो क्या चिंता, एक नाद, दैवीय आवाज, जो श्रवणपुट को प्रसन्न कर रही थी, वह आनंद मैंने लूटा, तो दो बार दर्शन, दो बार सुनने का अवसर मिला ..
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आज मै बहुत जिम्मेदारी से बोलना चाहता हूँ, ओशो केवल पंचभौतिक शरीर नहीं थे, आप सहमत हो न हो इसकी मुझे कोई चिंता नहीं ! इस विश्व की चोखट पर बहुत उजाला है इसलिए कहना चाहिए कि पृथ्वी नामक ग्रह से कोई गुजरा है .. ओशो यहां से सिर्फ भ्रमण करते हुए गए हैं .. ओशो को सुनना फैशन नहीं होना चाहिए, ओशो को फैशन से सुनना ओशो परम तत्व का अपमान है .. ओशो को स्वभाव से सुनो, स्वभाव ही आत्मा के बिल्कुल निकट से ज्यादा परिचय करवा सकता है .. ओशो के बारे में क्या कहूँ !
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यह मैं मेरी अपनी जिम्मेदारी से बोल रहा हूँ साहब ! आप कबूल करें ना करें इसकी मुझे चिंता नहीं .. कोई मुझे कहे कि ओशो के प्रति इतना बड़ा अहोभाव मुरारी बाबू प्रकट कर रहे है ! तो कर रहा हूँ .. **आज धर्म जगत में प्रवचन करने वाले रोज रात को अपने तकिए के नीचे ओशो की कैसेट सुनते हैं .. ओशो की कैसेट सुन कर ही सुबह ओशो का पुण्य स्मरण किए बिना ! तुम तुम्हारे नाम से सूत्रपात करते हो, इससे बड़ा अपराध क्या हो सकता है?**
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और सही धार्मिक व्यक्ति किसी को अछूत नहीं समझता है .. कोई धार्मिक व्यक्ति कैसे किसी को अस्पृश समझें? अब धर्म जगत तो धर्म जगत होता है, धर्म धुरंधर जगत तो और भी ऊंचा है .. **ओशो का नाम लेकर अहोभाव से कहना चाहिए कि ये विचार ओशो के हैं ..** ओशो के बारे में बोलने से आनंद आता है, और जिस पर बोलने में आनंद आए, वह भजन है ! वह साधना है !
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मैंने ओशो के बारे में एक कथा की है, पूना में की है .. धर्म जगत को तकलीफ हुई है, लेकिन किसी को तकलीफ हुई तो हम करें भी क्या? हम क्या कर सकते हैं? मैंने यह पूरी कथा ओशो की समाधी को समर्पित की है .. मेरा यह मनोरथ था साहब ! और कैंपस कथा का योग होगा तो "आई विल ट्राई" शुभ विचार जहाँ से मिले, ले लेना चाहिए !
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**तकिए के नीचे कैसेट डालकर सुनना, सुबह के प्रवचनों में उनके विचारों को डालना, बिना नाम लिए कि यह विचार ओशो के हैं, यह प्रज्ञा अपराध है** .. ओशो से जो मिला है तो इसमें शर्माने की बात क्या है .. तर्क उनका गजब का था, केवल उनको तार्किक कहना ओशो का अपमान है .. ओशो ने सामान्य भोग की बात नहीं की है साहब ! परम भोग की बात की है ! परम को भोगो ! किसको किस साधना से परम को पाना है ! उसके लिए सभी गेट खोल दिए है ओशो ने !
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पांच प्रकार से बने, एक बुद्ध पुरुष है ओशो ! ऐसा कोई माने या ना माने, मैं मानता हूँ .. आखिर में इतना ही कहना चाहता हूँ कि इस आदमी ने आचार्य रजनीश के रूप में संसार में परिभ्रमण करके शिक्षा दी .. भगवान रजनीश के रूप में पुणे में बैठकर उसने सबको दीक्षा दी .. और साहब; ओशो के रूप में पूरे विश्व को प्रेम की भिक्षा दी .. यही मोरारी बापू के ओशो है ..
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इतना कह कर मुरारी बापू चल दिए, परंतु किसी के बुलाने पर मुरारी बापू फिर मंच पर वापस आकर कहने लगे कि मैं ओशो सन्यासियों से कहना चाहता हूँ कि व्यास पीठ की तरह ही, ओशो पीठ स्थापित करके ओशो के विचारों को दुनिया में फैलाएं .. उस पीठ को व्यासपीठ नाम देने की जरूरत नहीं है ओशो पीठ दीजियेगा !
यह ओशो पीठ है ..
🌷 मोरारी बापू🌷

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