रविवार, 29 सितंबर 2019

= *सजीवन का अंग ८५(१/४)* =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*दादू जे तूं जोगी गुरुमुखी, तो लेना तत्त्व विचार ।*
*गह आयुध गुरु ज्ञान का, काल पुरुष को मार ॥*
==================
**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
.
*सजीवन का अंग ८५*
इस अंग में काल से छूटने विषयक विचार कर रहे हैं ~ 
अमर मिलै आतम अमर, विछुरत विनसै१ सोय । 
रज्जब रहे सु यूं रहे, सब सन्तन दिशि जोय ॥१॥ 
अमर ब्रह्म से मिलने पर आत्मा अमर होता है और ब्रह्म से बिछुड़ने पर वह बारम्बार जन्मता मरता१ है । सब सन्तों की ओर देख लो, जो भी काल से बच कर रहे हैं, वे उक्त प्रकार ही रहे हैं । 
जन जीवन जीवै सदा, ता में ताका दास । 
जन रज्जब जोख्यों गई, कदे न होय विनाश ॥२॥ 
जगत के जीवन रूप ब्रह्म सदा जीवित रहते हैं, उनमे मिलने पर उनके भक्त की भी बारम्बार मरना रूप विपति हट जाती है, उसका कभी भी नाश नहीं होता । 
ज्यों पावक झल१ शून्य२ में, त्यों परमात्मा में प्रान३ । 
रज्जब मारै काल क्यों, जो निकस न हो आन४ ॥३॥ 
जैसे अग्नि की ज्वाला१ आकाश२ में ही जाती है, वैसे ही परमात्मा में प्राणी३ जाता है, जो शरीर से निकल कर ब्रह्म से अन्य४ नहीं बनता, ब्रह्मरूप ही हो जाता है, उसे काल कैसे मार सकता है ? 
रज्जब शून्य ठाहरे शून्य में, तब ही आनन्द होय । 
चेतन चेतन को मिलै, काल न लागे कोय ॥४॥ 
आकाश, आकाश में ही मिलता है, वैसे हिं चेतन, चेतन में ही मिलै और काल उसके पीछे न लगे, तभी आनन्द होता है । 
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें