शुक्रवार, 20 सितंबर 2019

= *काल का अंग ८४(१३/१६)* =

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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*जे उपज्या सो विनश है, कोई थिर न रहाइ ।*
*दादू बारी आपणी, जे दीसै सो जाइ ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*काल का अंग ८४*
यहु तन जल का बुदबुदा, अल्प अधूरी आव२ ।
रज्जब रती१ न ठाहरै, तो परि कहा चवाव ॥१३॥ 
यह शरीर जल के बुदबुदे के समान है, जैसे जल के बुदबुदे की आयु२ अल्प है, वैसे ही इसकी आयु अधुरी है । यह क्षण१ भर भी नहीं ठहरेगा, ऐसे ही स्थिर रहने की क्या चर्चा करनी है ? 
जन रज्जब संसार में, रहसी रंक न राव । 
सब घट१ नाता२ देखिये, ओलों३ की सी आव४ ॥१४॥ 
इस संसार में राजा और रंक दोनों ही नहीं रहेंगे, सभी शरीरों१ के संबंध२ बर्फ के कंकरों३ की आयु४ के समान क्षणिक है । 
कर ही कर क्या कीजिये, अतिगति१ ओछी२ आव३ । 
जन रज्जब जोख्यों४ घणी५, जरा विपति जमराव ॥१५॥ 
यह कर यह कर ही क्या करते हो, आयु३ बहुत१ ही कम२ है, इसमें भी बुढापा, रोग और यमराज से भारी५ हानि४ होने की शंका है । अत: शीघ्र प्रभु का आश्रय लो । 
आभों१ पर अस्थल नहीं, विहंग न बैठा जाय । 
तो रज्जब संसार मध्य, आतम क्यों ठहराय ॥१६॥ 
संसार बादलों के समान है, जब बादलों१ पर स्थल नहीं है कोई भी पक्षी जाकर नहीं बैठा है, तब संसार में जीवात्मा कैसे स्थिरतापूर्वक रह सकेगा ? 
(क्रमशः)

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