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*#श्री०दादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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५२ - पँचम ताल
निकट निरंजन लाग रहे,
तब हम जीवित मुक्त भये ॥टेक॥
मर कर मुक्ति जहां जग जाइ,
तहां न मेरा मन पतियाइ ॥१॥
आगैं जन्म लहैं अवतारा,
तहां न मानैं मना हमारा ॥२॥
तन छूटे गति जो पद होइ,
मृतक जीव मिलैं सब कोइ ॥३॥
जीवित जन्म सफल कर जाना,
दादू राम मिले मन माना ॥४॥
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जब हम अति समीप हृदयस्थ व्यापक निरंजन राम के चिन्तन में लगकर रामस्वरूप में स्थिर हुये हैं, तब ही जीवितावस्था में सँसार - बन्धन से मुक्त हो सके हैं ।
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जगत के प्राणी मर कर जिस मुक्तिधाम को जाते हैं, उसमें हमारा मन विश्वास नहीं करता ।
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मुक्तिधाम में चिरकाल रह कर फिर अवतार रूप से जन्मते हैं, ऐसे सिद्धान्त में भी हमारा मन सन्तोष नहीं मानता ।
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यदि शरीर छूटने पर ही मुक्ति पद प्राप्त होता हो तो सभी जीव ब्रह्म में मिल जाते ।
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जो जीवितावस्था में ही राम का यथार्थ रूप जानकर अपने जन्म को सफल कर लेता है, तभी हमारा मन मानता है - यह राम में मिलकर सदा सजीवन रहेगा ।
(क्रमशः)

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