शुक्रवार, 20 सितंबर 2019

= ५२ =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷

🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*#श्री०दादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द* 
*राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
.
५२ - पँचम ताल
निकट निरंजन लाग रहे, 
तब हम जीवित मुक्त भये ॥टेक॥
मर कर मुक्ति जहां जग जाइ, 
तहां न मेरा मन पतियाइ ॥१॥
आगैं जन्म लहैं अवतारा, 
तहां न मानैं मना हमारा ॥२॥
तन छूटे गति जो पद होइ, 
मृतक जीव मिलैं सब कोइ ॥३॥
जीवित जन्म सफल कर जाना, 
दादू राम मिले मन माना ॥४॥
.
जब हम अति समीप हृदयस्थ व्यापक निरंजन राम के चिन्तन में लगकर रामस्वरूप में स्थिर हुये हैं, तब ही जीवितावस्था में सँसार - बन्धन से मुक्त हो सके हैं । 
.
जगत के प्राणी मर कर जिस मुक्तिधाम को जाते हैं, उसमें हमारा मन विश्वास नहीं करता । 
.
मुक्तिधाम में चिरकाल रह कर फिर अवतार रूप से जन्मते हैं, ऐसे सिद्धान्त में भी हमारा मन सन्तोष नहीं मानता । 
.
यदि शरीर छूटने पर ही मुक्ति पद प्राप्त होता हो तो सभी जीव ब्रह्म में मिल जाते । 
.
जो जीवितावस्था में ही राम का यथार्थ रूप जानकर अपने जन्म को सफल कर लेता है, तभी हमारा मन मानता है - यह राम में मिलकर सदा सजीवन रहेगा ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें