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*सो उपज किस काम की, जे जण जण करै कलेश ।*
*साखी सुन समझै साधु की, ज्यों रसना रस शेष ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ साँच का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग २* *मौन*
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दो भ्राताओं में प्राय: कलह रहा करता था । छोटा कुछ समझदार था । वह यह सोच करके कि यह प्रतिदिन का झगड़ा तो बहुत बुरा है, एक संत के पास गया और बोला - "भगवन् ! हम दोनों भाईयों में बड़ा कलह रहता है । इसलिये इसके मिटाने का कोई उपाय बतलावें ।"
संत- "भाई ! जब तेरा भाई कलह करने लगे उसी क्षण तू दांत भींच के बैठ जाया कर, कुछ भी न बोला कर । यदि ऐसा करेगा तो तुम्हारा कलह शान्त हो जायगा।" उसने वैसा ही किया ।
कुछ समय तक तो बड़ा भाई पूर्ववत् ही बकता रहा किन्तु अन्त मे एक दिन बकता-बकता हार करके छोटे भाई के चरण पकड़ कर बोला - "भाई ! मैं तुझे बिना कारण ही सताता रहता हूँ, तू बड़ा ही सहनशील है, सब सहन कर लेता है, मुझे जवाब तक नहीं देता । इसलिये अब मेरे अपराध को क्षमा कर । अब से आगे तुझे कुछ न कहुँगा ।"
तब छोटे भाई ने भी बड़े भाई के चरण पकड़ करके कहा "भाई साहब आप तो पिता के तुल्य है जो भी कहते है मेरे हित की ही कहते हैं। उसके लिये मैं क्या जवाब देता ।" फिर तो क्या था दोनों गले लगकर मिले और सदा के लिये कलह शांत हो गया । इससे ज्ञात होता है कि मौन रहने से कलह शांत हो जाता है ।
मौन रहे से कलह की, सुशांति देखी जाय ।
मौन किये से दूसरा, अन्त गया शरमाय ॥१६१॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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