शनिवार, 19 अक्टूबर 2019

गुरुदेव का अंग ७८/८१

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)
*भ्रम विध्वंस* 
*दादू पड़दा भ्रम का, रह्या सकल घट छाइ ।* 
*गुरु गोविन्द कृपा करैं, तो सहजैं ही मिट जाइ ॥७८॥* 
अहो ! अध्यास की क्या कथा कहें? वह तो प्राणिमात्र में जमा हुआ है । मैं कृश हूँ, मैं दीन हूँ, मैं अन्धा हूँ, मैं काला हूँ, दुर्बल हूँ, निर्धन हूँ-इत्यादि रूप से अध्यास तो सर्वत्र विद्यमान है और यह अध्यास गुरु गोविन्द की कृपा से ही दूर हो सकता है । गुरु की कृपा होने पर तो जैसे सूर्योदय के होते ही रात्रि का अन्धकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार अध्यास भी विना प्रयास के हट सकता है । महोपनिषद् में लिखा है- 
“विषय का त्याग, तत्त्वज्ञान और सहजावस्था- ये तीनों गुरुकृपा के विना दुर्लभ ही है ॥७८॥” 
*सूक्ष्म मार्ग* 
*दादू जिहिं मत साधू उद्घरैं, सो मत लिया सोध ।* 
*मन लै मारग मूल गहि, यह सतगुरु का परमोध ॥७९॥* 
अन्तः साधना को जानने वाले पूर्वाचार्यों तथा सूक्ष्मदर्शी सत्पुरुषों ने जीव-ब्रह्म की एकता का प्रदर्शन करने वाला श्रुति-स्मृति से सिद्ध एक ज्ञानमार्ग ही कल्याण का मार्ग बताया है । श्रुति में लिखा है- 
“ज्ञान के विना मोक्ष नहीं हो सकता ।” या “ज्ञान के समान इस संसार में दूसरों को पवित्र करने वाला दूसरा कोई मार्ग नहीं है ।” 
मुझे भी वही प्रिय है । उसी मार्ग से बहुत से साधक पुरुषों ने अपना उद्धार कर लिया । मैंने भी इसी मार्ग से चलते हुए अपने मन को ब्रह्म में लीन कर दिया है । 
महोपनिषद् में लिखा है- 
“गुरु और शास्त्र के मार्ग से तथा अपने अनुभव से चेतनस्वरूप परमात्मा में ‘मैं’ ही ब्रह्म हूँ”- ऐसा ज्ञान होने से मुनि शोकरहित हो जाता है ॥७९॥ 
*दादू सोई मारग मन गह्या, जिहिं मारग मिलिये जाइ ।* 
*वेद कुरानों ना कह्या, सो गुरु दिया दिखाइ ॥८०॥* 
वेद में कहा गया है कि “जो मानता है कि मेरा देवता अन्य है, मैं अन्य हूँ । इस प्रकार भेददृष्टि से अन्य देवता की उपासना करता है, वह उस ब्रह्म को नहीं जान सकता । वह तो देवताओं का पशु है ।” “जो भेदबुद्धि से देखता है वह तो मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है ।” इत्यादि श्रुतियों द्वारा द्वैत मार्ग में भय दिखाया गया है । अतः अद्वैत मार्ग ही कल्यानप्रद है । गुरु के बताये हुए उसी अद्वैत मार्ग को ही मैंने भी अपनाया है । जिस ब्रह्म का वेद भी “नेति, नेति” कहकर निषेधमुखेन ही वर्णन करते हैं, वेद और तप से भी दुष्प्राप्य है उस ब्रह्म को गुरुकृपा से मैंने जान लिया है । अहो ! गुरु की कृपा कितनी महान् है कि मैं भी उसके सहारे से ब्रह्मवित् हो गया । महोपनिषद् में लिखा है कि- 
“सब कुछ ब्रह्म है- जिसके अन्दर ऐसी भावना है, यह भावना मुक्ति देने वाली है । ‘मैं कुछ और हूँ, परमात्मा कुछ और है’- ऐसा मानना केवल अविद्या है । इसलिए जिज्ञासु को ऐसे भेदभावना को सर्वथा त्याग देना चाहिये ॥८०॥” 
*विचार* 
*दादू मन भुजंग यहु विष भर्या, निर्विष क्योंही न होइ ।* 
*दादू मिल्या गुरु गारड़ी, निर्विष कीया सोइ ॥८१॥* 
यह मन विषयविष से भरा हुआ सर्प है । अतः किसी प्रकार से भी यह निर्विष नहीं हो सकता । मेरे गुरु के पास विषनाशक मंत्रौषधि है, जिससे ज्ञानमंत्र द्वारा मेरा अज्ञानरुपी विष दूर हो गया । यह विषयविष अज्ञानजन्य होने से ज्ञान के विचार से ही नष्ट हो सकता है, क्योंकि ज्ञान अज्ञान का विरोधी है । यही ज्ञान का महत्त्व है । गीता में लिखा है- 
जिन्होंने ज्ञान के द्वारा अपना अज्ञान नाश कर लिया, उनको सूर्य की तरह सर्वत्र ज्ञान से उस परात्पर ब्रह्म का प्रकाश हो जाता है ॥८१॥ 
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें