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*दादू द्वै पख रहिता सहज सो, सुख दुख एक समान ।*
*मरै न जीवै सहज सो, पूरा पद निर्वाण ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*निष्पक्ष मध्य का अंग ८८*
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जैन कसाई की छुरी, पारस परसी आय ।
रज्जब देखो देखतां, कुल कर्म कुल१ कट जाय ॥९॥
देखो, लोह की छुरी जैन की हो वा कसाई की हो पारस से स्पर्श होने पर देखते देखते ही सुवर्ण बन जाती है, वैसे ही मानव कोई भी जाति का हो निष्पक्ष संत का उपदेश सुनकर धारण करने से उसके कुल परंपरा के दोष और संपूर्ण१ कर्म कट कर वह ब्रह्म बन जाता है ।
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हिन्दू तुरक हसेब१ करि, दोनों देखो जोय ।
जन रज्जब रहती२ रती, पावे विरला कोय ॥१०॥
हिन्दू और मुसलमान दोनों का ही ढंग१ विचार द्वारा देखलो, जो स्थिर२ ब्रह्म रूपी रती है, उसे तो कोई विरला निष्पक्ष संत ही प्राप्त करता है ।
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हिन्दू पावेगा वही, वोही१ मुसलमान ।
रज्जब रजमा२ रहम३ का, जिसको दे रहमान४ ॥११॥
जिस निष्पक्ष व्यक्ति को दयालु४ परमात्मा दया३ का बल२ देगा, वह हिन्दू हो वा मुसलमान हो, उसी१ प्रभु को प्राप्त होगा ।
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चंद सूर पाणी पवन, आभे१ उडग२ मझार३ ।
मध्य वासि प्रतिपाल मही४, घर अम्बर सु नियार ॥१२॥
चन्द्रमा, सूर्य, जल, वायु, बादल१ और तारे२ ये सभी पक्ष से रहित पृथ्वी और आकाश से अलग दोनों के बीच३ अंतरिक्ष में रहते हैं, इसी से पृथ्वी४ के जीवों का पोषण करते हैं, वैसे ही जो संत जाति भेषादि की पक्ष से रहित है, वही सांसारिक प्राणियों का ज्ञानोपदेश द्वारा रक्षक होता है ।
(क्रमशः)

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